हमको अपने दिन गिनना सिखा- लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
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हमको अपने दिन गिनना सिखा

“हमको अपने दिन गिनना सिखा, कि हम बुद्धि से भरा मन पाएं।” (भजन संहिता 90:12)

इस पद के साथ प्राय: ऐसे व्यवहार किया जाता है जैसे कि यह एक नीतिवचन था जिसका अर्थ है, “जीवन क्षणिक है, इसलिए बुद्धिमानी से जियो।” परन्तु सम्पूर्ण भजन के सन्दर्भ में, इसका अर्थ उससे कहीं अधिक बढ़कर है, जैसा कि हम देखेंगे। यह एक महत्वपूर्ण भाग है परमेश्वर पर तथा परमेश्वर के लोगों के जैसे जीने पर मनन करने का।

इब्रानी में, पद 12 इन शब्दों के साथ आरम्भ होता है “अपने दिन गिनना।” यह वाक्यांश समय के विषय को लेता है, जो इस भजन में बहुत ही व्यापक है। समय पर विचार करना हमें दिखाता है कि हम कितने निर्बल हैं और हमारे जीवन कितने छोटे हैं: “तू मनुष्य को धूल में पुनः लौटा देता है। और कहता है, ‘हे मनुष्य की सन्तान, लौट जाओ।’…तू उन्हें बाढ़ की भाँति बहा देता है; वे नींद के झोंके या भोर को उगने वाली घास के समान होते हैं : वह भोर को लहलहाती है और बढ़ती है, परन्तु सांझ को मुर्झाकर सूख जाती है।…हमारी आयु के वर्ष सत्तर तो होते हैं; चाहे बल के कारण अस्सी भी हो जाएं फिर भी उनके घमण्ड का आधार कष्ट और शोक ही है, क्योंकि यह शीघ्र समाप्त हो जाता है और हम जाते रहते हैं” (भजन संहिता 90:3, 5-6, 10)। यहां, भजन संहिता 90 मनुष्य की निर्बलता के विषय में भजन संहिता 89 की चिन्ता के साथ अपने सम्बन्ध को दिखाता है: “स्मरण कर कि मेरा जीवन कितना क्षणिक है। तू ने सब मनुष्यों को क्यों व्यर्थ सिरजा है? वह कौन मनुष्य है जो सदा जीवित रहे और मृत्यु को न देखे? क्या वह अपना प्राण अधोलोक से बचा सकता है?” (भजन संहिता 89:47-48)। हमारी निर्बलता के बारे में ऐसा यथार्थवाद किसी भी सच्ची बुद्धि की आवश्यक नींव है। “हे यहोवा, ऐसा कर कि मैं अपना अन्त जानूँ, और यह भी कि मेरी आयु के दिन कितने हैं, मैं यह भी जानूँ कि मैं कैसा क्षण-भंगुर हूँ” (भजन संहिता 39:4)।

मनुष्य के जीवन की क्षणिकता और निर्बलता पाप और संसार में न्याय के फल हैं। भजनकार उस पाप को खुले रूप से स्वीकार करता है, यह कहते हुए, “तू ने हमारे अधर्मों को अपने सामने, और हमारे गुप्त पापों को अपने मुख के प्रकाश में रखा है” (भजन संहिता 90:8)। वह जानता है कि उसका पवित्र परमेश्वर पापियों का न्याय करता है। “क्योंकि हमारे सब दिन तेरे क्रोध में कट जाते हैं, हम अपने वर्ष आह! के समान बिताते हैं… . तेरे क्रोध की शक्ति को, और तेरे भय योग्य रोष को कौन समझता है?” (भजन संहिता 90:9, 11)। यह सोचना निश्चित रूप से भयावह है कि परमेश्वर का क्रोध सभी आज्ञाकारिता को बराबर करेगा जो उसके प्रति होनी चाहिए थी।

यद्यपि जीवन क्षणिक है और परमेश्वर का प्रकोप भयावह है, फिर भी परमेश्वर की दया और उसकी सुरक्षा उसके लोगों के प्रति महान हैं। परमेश्वर ही अपने लोगों का निवासस्थान है: “हे प्रभु, तू पीढ़ी से पीढ़ी तक हमारा निवास स्थान बना हुआ है” (भजन संहिता 90:1)। अपने लोगों के सभी पीढ़ियों के लिए, यहां तक सृष्टि के समय से लेकर, परमेश्वर ने सदैव अपने लोगों को बनाए रखा और सुरक्षित रखा है। यहां तक कि अदन की वाटिका में, उसने प्रतिज्ञा की कि वह अपने लोगों को छुड़ाएगा (उत्पत्ति 3:15)। परमेश्वर अपने लोगों का निवासस्थान बना हुआ है क्योंकि वह छुड़ाने वाला परमेश्वर है।

मूसा हमें स्मरण दिलाता है कि जबकि मनुष्य का जीवन निर्बल और क्षणिक है, परमेश्वर अनन्त है। “इससे पूर्व कि पर्वत उत्पन्न हुए, या तूने पृथ्वी और जगत की सृष्टि की, हां, अनादिकाल से अनन्तकाल तक, तू ही परमेश्वर है” (भजन संहिता 90:2)। मूसा हमें पृथ्वी की सृष्टि से पूर्व ले जाता है यह स्मरण दिलाने के लिए कि हमारा परमेश्वर समय से पहले तथा समय और इस संसार से परे है। वह सर्वदा से है, और वह स्वयं में हमारे बिना पर्याप्त है। मूसा इस बात को दूसरी रीति से पद 4 में बताता है, “क्योंकि हज़ार वर्ष तेरी दृष्टि में कल के दिन के समान हैं, जो बीत गया, या जैसे रात का एक पहर।” परमेश्वर के लिए समय का अर्थ वह नहीं है जो हमारे लिए है। हमारे लिए, हज़ार वर्ष बहुत ही लम्बा समय है जिसको हम अनुभव करने की कल्पना भी नहीं कर सकते। परमेश्वर के लिए, यह छोटी सी समय अवधि से भिन्न नहीं है। वह अनन्त है, वह उस समय से परे है जिसे उसने बनाया है।

यह अनन्त परमेश्वर इतिहास को संचालित करता है अपनी असीम सामर्थ्य के द्वारा। मूसा, जिसने मिस्र से इस्राएल के छुटकारे में परमेश्वर की सामर्थ्य को देखा था, प्रार्थना करता है कि परमेश्वर के कार्य का प्रताप लोगों की आँखों के समक्ष बना रहेगा: “तेरे कार्य तेरे दासों पर और तेरा प्रताप उनकी सन्तानों पर प्रकट हो” (भजन संहिता 90:16)। जैसे परमेश्वर अपनी सामर्थ्य से दुख को लाया था, वैसे ही मूसा प्रार्थना करता है कि परमेश्वर आशीष को भेजेगा: “जितने दिन तू ने हमें पीड़ित किया, और जितने वर्ष हमने क्लेश भोगे, उन्हीं के अनुसार हमें आनन्द दे” (भजन संहिता 90:15)। यदि हमारी आवश्यकता है कि हम अपने दिन गिने परमेश्वर के अनन्त स्वभाव के विपरीत अपनी क्षणिकता को ध्यान में रखते हुए, तब परमेश्वर से हमारी प्रार्थना है कि वह हमें सिखाए: “हमको अपने दिन गिनना सिखा”। हम कभी भी उस पाठ को अपनी सामर्थ्य से नहीं सीख सकते हैं। यदि हम अपने आप पर छोड़ दिए जाएं  तो हम न केवल अज्ञानी ही हैं, परन्तु हम सत्य को अधर्म में दबाए रखते हैं (रोमियों 1:18)। हम अपने आप को विश्वास दिलाते हैं कि हमारे पास जीने के लिए लम्बा समय है, और जब तक हम स्वस्थ्य हैं, हम वास्तव में विश्वास करते हैं कि हम इस देह में सर्वदा के लिए जिएंगे। हमें एक शिक्षक की आवश्यकता है, और एक मात्र शिक्षक जो हमें स्वयं से बचा सकता है वह परमेश्वर है।

यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

डब्ल्यू. रॉबर्ट गॉडफ्रे
डब्ल्यू. रॉबर्ट गॉडफ्रे
डॉ. डब्ल्यू. रॉबर्ट गॉडफ्रे लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ के एक सह शिक्षक हैं और कैलिफ़ोर्निया के वेस्टमिन्सटर सेमिनरी में ससम्मान सेवामुक्त अध्यक्ष और प्रोफेसर हैं। वह कलीसिया के इतिहास के सर्वेक्षण के छह-भाग लिग्निएर शिक्षण श्रृंखला के लिए विशेष रूप से शिक्षक हैं और कई पुस्तकों के लेखक, जिसमें सेविंग रिफॉर्मेशन भी सम्मिलित है।