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25 सितम्बर 2025ख्रीष्टीय जीवन
परमेश्वर जीवन का देनेवाला है। पवित्रशास्त्र के आरम्भिक पृष्ठ उसकी जीवन देने वाले सामर्थ्य की पुष्ठि करते हैं, विशेष रीति से जहाँ पर हम उसे आदम के नथुनों में जीवन की श्वास फूँकते हुए देखते हैं। परमेश्वर ने आदम और हव्वा को उसके के साथ संगति के द्वारा सिद्ध जीवन का अनुभव करने और उनका परमेश्वर के दयालु शासन के अधीन रहने के लिए बनाया। परन्तु शैतान द्वारा आदम और हव्वा की परीक्षा ने, जिसका परिणाम मानवजाति का पतन हुआ, परमेश्वर की अच्छी सृष्टि को पाप और मृत्यु के अधीन कर दिया (रोमियों 5:12)।
आदम और हव्वा के पाप के पश्चात उनके नंगेपन को ढ़कने के लिए परमेश्वर का जानवरों की खालों का प्रावधान करना एक ऐसे सत्य को प्रकट करता है जो सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में खुलता होता है: पतन में जो कुछ खो गया था उसे पुनः प्राप्त करने के लिए बलिदान की आवश्यकता है। पुराने नियम के सन्तों ने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा किया कि परमेश्वर एक परम उद्धारकर्ता को भेजेगा जब वे उसके द्वारा आदेश दिए गए बलिदानों को चढ़ाते थे, जो उस आने वाले बलिदान का पूर्वाभास था जिसमें स्वयं परमेश्वर का पुत्र का बलिदान होगा।
इस्राएलियों का परमेश्वर के वाचा के प्रति विश्वासयोग्य बने रहने की असफलता के पश्चात् भी, परमेश्वर विश्वासयोग्य बना रहता है। परमेश्वर के चुने हुए समय पर, त्रिएकता का द्वितीय जन, यीशु ख्रीष्ट ने, एक कुँवारी से जन्म लेकर मानव शरीर धारण किया, और उस पृथ्वी पर चला जिसे उसने बनाया था। अपनी पृथ्वी पर की सेवकाई के समय, यीशु ने अपनी पहचान को स्पष्ट कर दिया: वह स्वयं जीवन है, और वह परमेश्वर के लोगों के लिए अपना जीवन देने के लिए आया (यूहन्ना 14:6; 10:11)। यीशु जीवन के अन्य मार्गों में से केवल एक मार्ग नहीं है। वह एकमात्र मार्ग है जो जीवन की ओर ले जाता है; अन्य सभी मार्ग मृत्यु की ओर ले जाते हैं। केवल यह विश्वास करने के द्वारा ही कि वह परमेश्वर के धर्मी मागों को सन्तुष्ट करने के लिए एकमात्र सिद्ध और अन्तिम बलिदान है, हमारे पास जीवन हो सकता है (यूहन्ना 20:31)।
जब हम अपना भरोसा उद्धारकर्ता के रूप में केवल ख्रीष्ट पर करते हैं, हम आत्मिक मृ्त्यु से निकलकर जीवन में प्रवेश करते हैं (यूहन्ना 5:24)। अब हमारा ख्रीष्ट से मिलन हो गया है । हम ख्रीष्ट में हैं। और इस प्रकार मसीही जीवन आरम्भ होता है।
इसलिए, मसीही जीवन अपने स्वयं के प्रयासों और अपनी शक्ति से एक नैतिक जीवन जीने का प्रयास नहीं है। मसीही जीवन कलीसिया में उपास्थित होने, एक “भले” व्यक्ति होना, या बाइबल का ज्ञान रखने से उत्पन्न नहीं होता है। इसकी अपेक्षा, मसीही जीवन पवित्र आत्मा के द्वारा हम में कार्यरत पुनरुत्थित ख्रीष्ट के जीवन से कम नहीं है, जो हमें ख्रीष्ट की महिमा और ख्रीष्ट की सुन्दरता को देखने और उसकी आराधना करने में सक्षम बनाता है, और हमें उसके पदचिन्हों पर चलने के लिए सशक्त बनाता है जैसे हम त्रिएक परमेश्वर और दूसरों के प्रति प्रेम में बढ़ते हैं।
यह मसीही जीवन है—जिसमें परमेश्वर अपनी सम्प्रभुता में होकर अपने लोगों को नया हृदय देकर मृत्यु से जीवन की ओर लाता है, जिससे वे क्रूस पर चढ़ाए गया और पुनरुत्थित यीशु को पापियों के लिए एकमात्र आशा के रूप में सरहाने के लिए प्रेरित होते हैं, और उसके साथ मिलन में, उसकी निकटता और अनुरूपता में बढ़ते हैं, और यह सब उसके महिमामय अनुग्रह की स्तुति के लिए होता है (इफिसियों 1:6)।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

