दाख के मज़दूरों का दृष्टान्त - लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
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दाख के मज़दूरों का दृष्टान्त

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का नौववां अध्याय है: यीशु के दृष्टान्त

“काल्पनिक बगीचा जिनमें वास्तविक मेंढक हैं।” इस प्रकार एक लेखक ने यीशु के दृष्टान्तों का वर्णन किया है। वे कल्पनाशील कहानियाँ हैं, परन्तु वे वास्तविक जीवन से सम्बन्ध रखती हैं। वे काल्पनिक बगीचे हैं, परन्तु उनमें वास्तविक मेंढक हैं। प्रायः वे मेंढक हम होते हैं।

 मत्ती 20:1-16 प्राचीन संसार में एक सामान्य परिस्थिति के साथ प्रारम्भ होता है। एक ज़मींदार को श्रमिकों की आवश्यकता होती है, इसलिए उसने कुछ दिहाड़ी मज़दूरों को भर्ती किया। जैसे-जैसे दिन बीत रहा था, उसे और मज़दूरों की आवश्यकता पड़ी। इसलिए, वह कई बार लौटा, जब तक कि छोड़ने के समय से एक घंटे पहले तक न रह गया।

परन्तु तब दाख-वाटिका का स्वामी कुछ विचित्र करता है। दिन के अन्त में, उसने सबको एक साथ बुलाया और उन पुरुषों को जिन्होंने मात्र एक घंटे कार्य किया पूरे दिन की मज़दूरी का भुगतान किया। यह अचम्भा करने वाला उदार कार्य भीड़ में कोलाहल पैदा कर देता है। दिन भर मज़दूरी करने वाले श्रमिक जल्दी से गणित लगाते हैं। “यदि उन एक घंटे के श्रमिकों को इतने पैसे मिले, तो हम तो धनवान हो जाएंगे,” वे सम्भवतः सोच रहे थे। वे सोचते हैं कि वह उनका भाग्यशाली दिन है।

तो, हम समझ सकते हैं कि जब भुगतान उन को मिल गया और वही मज़दूरी उनके फैलाए और फफोले पड़े हाथों में रखी गयी जो कि उनके हाथों में रखी गयी थी जिन्हें बाद में कार्य पर रखा गया था, वे प्रसन्न नहीं थे। यह एक न्यूनोक्ति है। वे पागल थे—इतने पागल कि खुलकर अपने हितकारी से कुड़कुड़ाने लगे। स्वामी प्रत्युत्तर देता है कि उसने उचित और सहमत धनराशि का भुगतान किया है। वह किस रीति से अपने धन को व्यय करने को चुनता है, जिस में उन लोगों के साथ उदार होना सम्मिलित है जिनके पास कार्य करने का कम अवसर था, यह उसके ऊपर है। बुड़बुड़ाने वाले श्रमिकों के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार नहीं किया गया है। उनकी भावनात्मक हलचल उनकी ईर्ष्या पर आधारित अपेक्षाओं के कारण है, अन्याय के कारण नहीं।

कलीसिया के इतिहास में, इस दृष्टान्त की व्याख्या कई बार प्रयासित रही है। कुछ सुझाव है कि पाँच विभिन्न नियुक्तियाँ विश्व इतिहास के पाँच चरणों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिन में परमेश्वर ने लोगों को अपने पास बुलाया है, जीवन के विभिन्न चरण जिसमें कोई मसीही बन सकता है। तो, बिन्दु यह है कि परमेश्वर सबके लिए अनुग्रहकारी है और अपने राज्य में सबका स्वागत करता है, चाहे उन्हें किसी भी समय बुलाया गया हो। कुछ कहते हैं कि दृष्टान्त परमेश्वर के भविष्य के राज्य का चित्र है जिसमें सभी बचाए हुए लोगों को स्वर्ग प्राप्त होता है, चाहे परमेश्वर के लिए उन्होंने कितना भी कार्य किया हो। सबसे विस्तृत और सम्भवतः सबसे लोकप्रिय व्याख्या यह है कि यह दृष्टान्त पूर्ण रूप से परमेश्वर के अतुल्य और अद्भुत अनुग्रह और उदारता का चित्र है—अति संक्षेप में सुसमाचार।

इनमें से प्रत्येक व्याख्या में कुछ सत्य है। परन्तु देखने के लिए इससे भी अधिक कुछ है। सन्दर्भ पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है जो मत्ती हमें इस दृष्टान्त के लिए देता है। हमारे दृष्टान्त से पहले की कहानी एक आराधनालय के धनी अगुवे की है जो यीशु का अनुसरण नहीं करता, क्योंकि उसको स्वयं की सम्पत्ति से प्रेम बहुत अधिक था (19:16-22)। इसके प्रत्युत्तर में, चेले अचम्भित हैं। फिर यीशु उन्हें सब कुछ को त्यागकर उसके पीछे चलने के लिए चौंका देने वाले प्रतिफलों की प्रतिज्ञा करता है (23-30)। इस प्रतिज्ञा ने, कि चेले बारह सिंहासनों पर बैठेंगे, चेलों के विचारों को इतना अधिक भर दिया कि इसके तुरन्त बाद ही, याकूब और यूहन्ना यीशु के निकटतम सिंहासनों पर बैठने वाले बनने का प्रयास करने लगे (20:20-28)।

यह सन्दर्भ हमें दिखाता है कि दृष्टान्त हमारे हृदयों पर, स्वजॉनथन टी. पेनिंग्टन-अभिनन्दन और ईर्ष्या के दोहरे विषय के केन्द्र पर प्रहार कर रहा है। जब युवा शासक खाली हाथ चला जाता है पर तब कमतर चेलों को शासका बनाने की प्रतिज्ञा की जाती है, चेलों के लिए थोड़ा भी स्व-अभिनन्दनीय न बनना, अपनी बुद्धिमानी की उपलब्धि पर और यीशु का अनुसरण करने के उनके बेहतर चुनाव पर गर्व न करना असम्भव था। दृष्टान्त में, यीशु उन्हें स्मरण दिलाता है कि सब कुछ जो उनके पास है वह परमेश्वर की ओर से है, कि उनकी सारी आशीषें परमेश्वर की उदारता से हैं, उनके अपने कार्यों से नहीं। चेले धनी मनुष्य से श्रेष्ठ नहीं है। ठीक उसी समय, यीशु हमारे हृदयों पर दबाव डालता है, जिसका झुकाव ईर्ष्या की ओर है। यीशु अपने चेलों को जो दूसरों की वस्तुओं को देखने और कड़वे एवं डाह नहीं करने की चुनौती देता है। प्रतिद्वंद्विता आत्म-विनाशक है क्योंकि समस्त जीवन परमेश्वर की ओर से उपहार है।

तो, यह दृष्टान्त हमें अपने प्रति और दूसरों के प्रति परमेश्वर के उदार अनुग्रह का दर्शन देता है। जीवन तब प्राप्त होता है जब हम अपनी आँखें क्षैतिज स्थिति में नहीं कि औरों के पास क्या है अपितु लम्बाकार स्थिति में पूरे-पृथ्वी के ज़मींदार, राजा यीशु पर टिकाते हैं, जो हमें मित्र कहता है और जो हमें बुद्धिमानी और उदारता से देता है।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।