हार न मानने वाली विधवा का दृष्टान्त - लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
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हार न मानने वाली विधवा का दृष्टान्त

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का दसवां अध्याय है: यीशु के दृष्टान्त

पहली दृष्टि में तो, हार न मानने वाली विधवा का दृष्टान्त (लूका 18:1-8) हम पर अटपटा प्रभाव डालता है, और बहुत से पास्टर और साधारण लोग इसे समझने के लिए संघर्ष करते हैं। परन्तु यह दृष्टान्त, जब इसके सन्दर्भ में समझा जाता है, अद्भुत अर्थ निकालता है और परमेश्वर लोगों को विश्वास में बढ़ते जाने के लिए आग्रह करता है।

सन्दर्भ के आधार पर, हम यरूशलेम की लम्बी यात्रा की समाप्ति के निकट हैं, एक यात्रा जो लगभग लूका के सुसमाचार के एक तिहाई भाग में पाई जाती है (9:51-19:44) । यह दृष्टान्त मनुष्य के पुत्र के रूप में यीशु की वापसी पर उसके उपदेश के ठीक बाद आया है, एक घटना जो कि इतिहास के अन्त में घटित होगी (17:20-37)। ख्रीष्ट के प्रथम और द्वितीय आगमन की अवधि के मध्य में, वाचा का समुदाय बड़े कष्ट और सताव को सहेगा, इसलिए दृष्टान्त विश्वासियों को दृढ़ रहने के लिए प्रेरित करता है। लूका के सुसमाचार में अन्य दृष्टान्तों से भिन्न, हार न मानने वाली विधवा का दृष्टान्त एक उद्देश्य कथन के साथ प्रारम्भ किया गया है: “यह बताने के लिए कि निराश हुए बिना उनको सदैव प्रार्थना करना चाहिए” (18:1, देखें 5:36; 6:39; 12:16; 13:6)। वाक्यांश “निराश होना” नए नियम में प्रायः अन्त के समय के सताव में बने रहने सन्दर्भ में आता है। उदाहरण के लिए, पौलुस इफिसुस की कलीसिया को कहता है “उन क्लेशों के कारण जो मैं तुम्हारे कारण सह रहा हूँ निरुत्साहित न होना, क्योंकि वे तुम्हारी महिमा हैं” (3:13; 2 कुरिन्थियों 4:1, 16; गलातियों 6:9; 2 थिस्सलुनीकियों 3:13 भी देखें)।

इस दृष्टान्त का सामान्य प्रवाह अत्यन्त सरल है: एक विधवा दृढ़तापूर्वक मूर्तिपूजक न्यायाधीश से निवेदन करती है उसे न्याय दिलाने के लिए। दृष्टान्त के लगभग सभी विवरण अस्पष्ट हैं‌—हम कुछ नहीं जानते कि क्यों या कैसे विधवा के साथ अन्याय हुआ था, हम “विरोधी” के बारे में कुछ नहीं जानते, और इसके बारे में भी नहीं कि ऐसा कहाँ हुआ सिवाए इसके कि “किसी नगर में” (लूका 18:2)। पर हम न्यायधीश के स्वभाव के बारे में कुछ सीखते हैं। वह “ न तो परमेश्वर से डरता था और न किसी मनुष्य की परवाह करता था” (पद 2) और, विधवा के हार न मानने के कारण, उसने एक अनुकूल निर्णय दिया (पद 5)।

दृष्टान्त दो मुख्य विषयों पर निर्भर है: न्याय और दृढ़ता। लूका विशेष ध्यान देकर कहता है कि न्यायाधीश अविश्वासी था। क्यों? विचार यह है कि यदि एक अधर्मी न्यायाधीश हार न मानने पर अनुकूल निर्णय देता है, ऐसे के लिए एक धर्मी न्यायाधीश और कितना अधिक करेगा? “न्याय” के लिए संज्ञा और क्रिया रूप पूरे दृष्टान्त में पाए जाते हैं, जो पद 3, 5, 7 और 8 में आते हैं। हालाँकि, यह न्याय का सामान्य रूप नहीं है। यहाँ यह शब्द कई ऐसे खण्डों  में पाया जाता है जो कि प्रतिकार या पलटा के कार्यों का वर्णन करता है—ऐसे व्यक्ति के लिए न्याय जिसका शोषण हुआ हो। उदाहरण के लिए, प्रेरितों के काम 7:24 में, स्तिफनुस मूसा के जीवन से एक घटना का विवरण करता है: “उनमें से एक के साथ अन्याय होता देख, [मूसा ने] उत्पीड़ित व्यक्ति की रक्षा की और मिस्री को मार कर उसका बदला लिया” (निर्ग 2:11-12 देखें)। यहाँ “अन्याय हुआ” और “बदला लेने” के लिए शब्द उन्हीं शब्दों से लिए गए हैं जिन्हें हम लूका 18:3 में पाते हैं (रोमियों12:19; 13:4; इब्रानियों 10:30; 1 पतरस 2:14; प्रकाशितवाक्य 6:10)। तब, दृष्टान्त में विधवा, प्रतिकार और न्याय की मांग कर रही है। उसकी इच्छा है कि न्यायाधीश उसे दण्डित करे जिसने अन्याय पूर्वक उसको ठेस पहुँचाया है।

हमें इस पर विचार करना अच्छा होगा कि यह दृष्टान्त लूका 17-18 के व्यापक सन्दर्भ में कैसे उपयुक्त बैठता है। इससे पहले के खण्डों में, यीशु की अधिकतर शिक्षा उसके द्वितीय आगमन से पहले विश्वासियों की दृढ़ता से सम्बन्धित है (17:22-37)। जैसे-जैसे इतिहास की परतें खुलती हैं, परमेश्वर के लोगों और संसार के मध्य शत्रुता बढ़ती है। हम “अन्तिम दिनों” में जी रहे हैं, एक समय अवधि जो कि आश्चर्यजनक रूप से परमेश्वर के राज्य और क्लेश की उपस्थिति से चिह्नित किया गया है (मत्ती 13:24-50)। राज्य में भाग लेना अवश्य रूप से बड़े कष्ट और सताव को लाता है। सच्चे विश्वासियों को राज्य के लिए अपने जीवन को खोने के लिए तैयार रहना चाहिए (लूका17:33)। उनके साथ अन्याय होगा,और संसार इससे भी अधिक बुरा करेगा। पर, क्योंकि विधवा दृढ़ रही, न्यायाधीश ने उसका बदला लिया। क्योंकि सच्चे विश्वासी विश्वास में बढ़ते जाते हैं, परमेश्वर उनका बदला लेने की प्रतिज्ञा करता है। विश्वास अवश्य ही परमेश्वर का उपहार है, एक शुद्ध अनुग्रह का कार्य (इफिसियों 2:8-9), परन्तु सच्चा विश्वास सर्वदा विश्वासयोग्य कार्यों के साथ होता है (याकूब 2:14-26)। सम्भवतः हार न मानने वाली विधवा के दृष्टान्त का एक सबसे निकटतम खण्ड प्रकाशितवाक्य 6:10 में पाँचवी मुहर है, जहाँ स्वर्ग में मृतक सन्त परमेश्वर को पुकार रहे हैं “हे पवित्र और सच्चे प्रभु, तू कब तक न्याय न करेगा? तथा कब तक पृथ्वी के निवासियों से हमारे रक्त का प्रतिशोध न लेगा?” जैसा कि स्वर्गीय सन्तों के साथ हम भी परमेश्वर का संसार पर अपने न्याय को उण्ड़ेलने के लिए लालायित हैं, वह हमें एक बात याद दिलाता है: “थोड़ी देर तक और विश्राम करो” (पद 11)।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
बेन्जमिन एल. ग्लैड्ड
बेन्जमिन एल. ग्लैड्ड
बेन्जमिन एल. ग्लैड्ड जैक्सन, मिस्सिसिप्पी में रिफॉर्म्ड थियोलॉजिकल सेमिनरी में नए नियम के सहायक प्राध्यापक हैं। वे कई पुस्तकों के लेखक या सह-लेखक हैं, जिनमें आदम और इस्राएल से कलीसिया तक (From Adam and Israel to the Church) सम्मिलित है।