ईश्वरविज्ञान, ईश्वरविज्ञान, ईश्वरविज्ञान: लिग्निएर क्यों? - लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
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ईश्वरविज्ञान, ईश्वरविज्ञान, ईश्वरविज्ञान: लिग्निएर क्यों?

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का दूसरा अध्याय है: वर्तमान सर्वदा के लिए महत्व रखता है

हमारे प्रिय संस्थापक डॉ. आर. सी. स्प्रोल के 2017 में निधन के समय से लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ निरन्तर बढ़ रही है। कई नए सदस्य अपनी दक्षता और कौशल के साथ हमारे साथ जुड़े हैं। उनके उल्लेखनीय प्रयासों के माध्यम से सुसमाचार प्रचार के कार्य का विकास देखना उत्साहजनक है। परन्तु किसी भी स्थायी उद्यम को अपना ध्यान मूल मिशन पर बनाए रखना चाहिए और उस पर से न हटने के प्रति सावधान रहना चाहिए। इसलिए, हमारी कई बैठकों में, मैं प्रायः उस एक बात को दोहराता हूँ जो हम लिग्निएर में करते हैं: ईश्वरविज्ञान, ईश्वरविज्ञान, ईश्वरविज्ञान। नहीं, मैं गिनती करना नहीं भूला हूँ। बात यह स्मरण रखना है कि ईश्वरविज्ञान एक सेवकाई के रूप में हमारे मिशन के लिए ही नहीं परन्तु व्यक्तियों के रूप में हमारे जीवनों के लिए कितना महत्वपूर्ण है। आइए मैं इसका उदाहरण दूँ।

सम्भवतः आप ब्रिटिश संग्रहालय में गए हों। यह मेरे पसंदीदा स्थानों में से एक है। विश्व इतिहास के कई हज़ार वर्षों से अद्भुत प्राचीन कालीन वस्तुओं के पास से गुजरना विस्मयकारी है। प्रत्येक शिल्पकृति एक कहानी को बताती है। परन्तु अभी हाल ही की यात्रा में, मैंने यह जाना कि हर एक शिल्पकृति पूरी कहानी को नहीं बताती है।

मेसोपोटामिया के संग्रह में अश्शूर की शिल्पकृतियों का एक क्षेत्र है जिसमें सन्हेरीब के भी कुछ शिल्पकृति सम्मिलित हैं, वह हिंसक राजा जिसके विषय में हम पुराने नियम में पढ़ते हैं। उसके दिनों में, वह मध्य पूर्व का आतंक था, जिसने नगरों की घेराबन्दी और राष्ट्रों को हराता था। यरूशलेम के मार्ग में, एक छोटे सुदृढ़ नगर, लाकीश की घेराबन्दी की ब्रिटिश संग्रहालय में एक नक्काशी है। विजय प्राप्त करने वाले मूर्तिपूजक राजा प्रायः अपनी विजय पर घमण्ड करने के लिए ऐसी स्मारकों की स्थापना करते थे। इसका दृश्य सन्हेरीब द्वारा लाकीश में इस्राएलियों के भयंकर वध को दर्शाता है।

ब्रिटिश संग्रहालय में क्या नहीं है? हम जानते हैं कि सन्हेरीब यरुशलेम को नष्ट करने के लिए और यहूदा पर विजय प्राप्त करने के मार्ग पर था (2 राजा 18:13-19:37)। जब सेनाएँ नगर को घेरने आयीं, यशायाह नबी ने हिजकिय्याह राजा को प्रभु के छुटकारे पर भरोसा करने का परामर्श दिया। यरूशलेम पर सन्हेरीब की विजय को बताने वाली कोई शिल्पकृति नहीं है क्योंकि ऐसा कभी हुआ ही नहीं। बाइबल बताती है कि प्रभु के एक दूत ने रात भर में विदेशी राजा की सेना को नष्ट कर दिया, और उसने अभियान को रोक दिया और नीनवे लौट गया।

प्रभु अपने लोगों के लिए लड़ता है। अश्शूरियों का पराक्रम उसकी बराबरी नहीं कर सका। इस्राल की पीढ़ियों तक यही सच्चाई आगे बढ़ाई गयी थी कि केवल एक ही परमेश्वर है और वह शान्त नहीं है (निर्गमन20:1-20; व्यवस्थाविवरण 6:4; यशायाह 44:6-8)।

ईश्वरविज्ञान  शब्द का साधारण अर्थ है परमेश्वर का या उसके विषय में अध्ययन। ईश्वरविज्ञान कोई अरुचिकर और मन्द शैक्षणिक प्रयास नहीं है। ईश्वरविज्ञान एक छुरे की धार है जिसमें दोनों छोर पर जीवन या मृत्यु है। इस्राएलियों के पास सही ईश्वरविज्ञान था और वे जीवित रहे । अश्शूरियों के पास भ्रष्ट ईश्वरविज्ञान था और वे नष्ट हो गए। प्रत्येक प्राण के लिए जोखिम इससे ऊँचे नहीं हो सकते। यीशु ख्रीष्ट ने कहा कि परमेश्वर को जानना और उसे जिसे उसने भेजा है उसे जानना अनन्त जीवन में प्रवेश करना है (यूहन्ना 17:3)।

आदम और हव्वा पहले तो परमेश्वर को वास्तव में जानते थे, और फिर उन्होंने उस सत्य को अधार्मिकता में दबा दिया, और इस प्रकार अविश्वास ने विश्व का विनाश कर दिया और हमें मूल रूप से नष्ट कर दिया। तब अदन से निर्वासन के उस दुखद क्षण से, हम अपनी स्वाभाविक अवस्था में पवित्र सृष्टिकर्ता के विरुद्ध एक अपवित्र युद्ध में हैं। राष्ट्रों के मध्य युद्ध और एक दूसरे के साथ शान्ति का अभाव हमारे प्रथम विद्रोह की अभिव्यक्ति मात्र है। हमने पाप के साथ कितना कुछ कर दिया है, और अपने आप उससे बचने के उपाय भी नहीं है। यदि हमें बचना है, तो इसे हमारे बाहर से आना चाहिए। अच्छे ईश्वरविज्ञान के बिना, वास्तविकता चित्र खण्ड पहेली (jigsaw puzzle) के समान है जिसके छोटे-छोटे टुकड़े बिखरे पड़े हैं, जिसमें कोई एकीकृत चित्र नहीं है। ईश्वरविज्ञान, सही से समझे जाने पर, पहेली को समझने में सहायता के लिए हमें वास्तविकता का एक चित्र देता है। यह हमें टुकड़ों को पुनः जोड़ने में मार्गदर्शित करता है, उसी प्रकार से जैसा चित्र पहेली के डिब्बे के ऊपर होता है, ताकि हम संसार को और अपने आप को उचित रूप से समझ सकें। इस प्रकार, ईश्वरविज्ञान मानव ज्ञान और अनुभव के प्रत्येक क्षेत्र को बताता है।

डॉ. आर. सी. स्प्रोल ने ईश्वरविज्ञान पर शिक्षण के रूप में ध्यान केन्द्रित किया, जिसमें वह सब सम्मिलित है जिसे परमेश्वर ने सामन्य रूप से और विशेष रूप से प्रकट किया। मानव जाति परमेश्वर से दूर है। अपने प्रथम माता-पिता के समान, हम जन्म से सत्य के दमनकर्ता हैं। हाँ, हर कोई जानता है कि वह  परमेश्वर है, परन्तु हर कोई यह नहीं जानता कि परमेश्वर कौन  है। यह हमारी मूलभूत समस्या है—हम यह नहीं जानते कि परमेश्वर कौन है। और क्योंकि हम यह नहीं जानते कि परमेश्वर कौन है, हम यह नहीं जानते कि हम कौन हैं।

लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ 1971 के ग्रीष्मकाल में प्रारम्भ हुई जब कि संयुक्त राष्ट्र 1960 के उपद्रवी दशक से ऊभर रहा था। मसीहियों ने अनियंत्रित सापेक्षवाद और सामाजिक उथल-पुथल का सामना किया। धर्मनिरपेक्षतावाद संस्कृति में तीव्र हो गया, और उदारवाद ईश्वरविज्ञान कई कलीसियाओं और मतसम्बन्धों में कैंसर के समान फैल गया। वहीं पेन्सिलवेनिया के एलेघेनी पर्वतों की तलहटी में लिग्निएर नामक एक छोटे से नगर के समीप, एक छोटी सी सेवकाई ने परमेश्वर को उत्तम रूप से, गहरी रीति से जानने और उसे ज्ञात करने के लिए मसीहियों को तैयार करना प्रारम्भ किया। यह शिष्यता और प्रशिक्षण के प्रयास शास्त्रसम्मत मसीहियत की रक्षा करने की इच्छा से प्रेरित था, और, आशापूर्वक, जानकार और स्पष्ट बोलने वाले मसीहियों के साथ संस्कृति को प्रवाहित करने में सहायता करना था जो महान आदेश को आगे ले जाने में विश्वासयोग्य पाया जाना चाहते थे। प्रारूप के अनुसार, यह अत्यधिक शक्तिशाली मीडिया और वित्त पोषित प्रचलित मत की कलीसियाओं एक प्रयास था।

बढ़ती हुई मात्रा के साथ आज कलीसिया जिस प्रत्यक्ष सांस्कृतिक शत्रुता का सामना कर रही है, वह जो केवल नाम के मसीही हैं वे छोड़ कर जा रहे हैं। समन्वयतावादी (syncretistic) प्रचलित मत की कलीसिया विलुप्त हो रही हैं। कलीसिया का भविष्य दृढ़ विश्वास के मसीहियों का है। सारी समस्याएँ जिनका हम सामना करते हैं वे अन्ततः ईश्वरविज्ञानीय हैं: ध्वंसावशेषों को सुधारने के लिए, समाधान ईश्वरविज्ञानीय होना चाहिए।

परमेश्वर को धन्यवाद हो, कि पिछले कुछ वर्षों में, परमेश्वर डॉ. स्प्रोल के दर्शन में कई विद्यार्थियों को लाया है जो प्रभु यीशु ख्रीष्ट के सुसमाचार को फैलाने के प्रति समर्पित हैं और पवित्रशास्त्र में निहित ईश्वरविज्ञान को हर स्थान में कलीसियाओं में विकसित होते देख रहे हैं। श्रम अधिक है, हाँ, फिर भी प्रतिज्ञा निश्चित है: “क्योंकि पृथ्वी यहोवा की महिमा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसे समुद्र जल से भर जाता है” (हबक्कूक2:14)। हम उस प्रयास में सहयोगी हैं। यह सुसमाचार का आश्चर्य है कि पापी पुरुषों और महिलाओं का उपयोग इस पतित संसार में, संसार के साथ, हमारी स्वयं की देह के साथ और शैतान के साथ हमारे युद्ध में और उसके द्वारा कार्य करते हुए परमेश्वर के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है।

अपनी उत्कृष्ट पुस्तक परमेश्वर की पवित्रता (The Holiness of God)  में डॉ. स्प्रोल रोमियों 12:2 पर टिप्पणी करते हैं:

पौलुस जिस मुख्य विधि को जीवन को परिवर्तित करने के माध्यम के रूप में रेखांकित करता है वह है “मनों का नया हो जाना।” इसका अर्थ शिक्षा से कुछ भी कम या कुछ भी अधिक नहीं है। गम्भीर शिक्षा। गहन शिक्षा। परमेश्वर की वस्तुओं में अनुशासित शिक्षा। यह परमेश्वर के वचन में प्रवीणता की माँग करता है। हमें वैसे लोग बनने की आवश्यकता है जिनका जीवन परिवर्तित हो गया क्योंकि हमारे मन परिवर्तित हो गए हैं।

परमेश्वर के अनुग्रह से, डॉ. स्प्रोल के ईश्वरविज्ञान पढ़ाने के प्रगाढ़ केन्द्र ने कई जीवनों को परिवर्तित किया है। उनका विश्वास था कि हर कोई ईश्वरविज्ञानी है और वही अभी और सदैव के लिए महत्व रखता है कि आप अच्छे ईश्वरविज्ञानी हैं या बुरे। मानव मन को सूचना मात्र देना अपर्याप्त है। पवित्रशास्त्र की ज्योति और पवित्र आत्मा के कार्य के माध्यम से, हम परमेश्वर के पवित्र चरित्र को समझना और अपने पापीपन को आभास करना आरम्भ करने लगते हैं। कलीसिया को परमेश्वर की पवित्रता को उसकी परिपूर्णता में घोषित करने, सिखाने, और रक्षा करने के लिए एक अटल समर्पण की पुनः खोज करनी चाहिए। यह केवल लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ मिशन का कथन नहीं है; यह प्रत्येक विश्वासी की बुलाहट है। परमेश्वर के चरित्र को घटाया और सुसमाचार के साथ हम अविश्वासी के पास पहुँचने की अपनी क्षमता को मन्द कर दिया। विकास केन्द्रित मिशन रणनीतियाँ जो पूर्ण विचारित हो वह सम्भवतः अस्थायी लाभ प्रदान कर सकती हैं, परन्तु ऐसी रणनीतियाँ न तो कभी स्वस्थ चेलों को विकसित करेंगी और न ही कभी स्वस्थ कलीसियाओं की स्थापना करेंगी। निकटदर्शी सेवकाई कार्यरतता दीर्घकालिक नहीं है। केवल संख्याओं के लिए ईश्वरविज्ञानीय समझौता घातक है।

यद्यपि परमेश्वर के लोगों ने प्रायः अपने नियंत्रण के बाहर की परिस्थितियों में स्वयं को निराश पाया है, संसार में परमेश्वर के मिशन की प्रगति निश्चित है। हम भी एक अन्य भयानक क्षण में जब इस्राएलियों को धमकाया गया था, एलीशा के सेवक के समान विरोध के तूफानी बादल आने पर क्रोधित होने के लिए प्रलोभित होते हैं। फिर भी हमें स्मरण रखना चाहिए कि “जो हमारे साथ हैं वे उनसे अधिक हैं जो उनके साथ हैं” (2 राजा 6:16)।

जबकि लिग्निएर सेवकाई के पचासवें वर्ष को चिन्हित करता है, हम अपने अतीत पर परमेश्वर की आशीषों के लिए धन्यवाद देते हैं। परन्तु, यह प्रकट है कि हमारे पास परमेश्वर के लोगों की सेवा करने का अवसर है जैसा कि पहले नहीं था। राष्ट्रों के मध्य बहुत कार्य किया जाना है। क्या आप प्रार्थना करेंगे कि परमेश्वर और लोगों को जागृत करे यह जानने के लिए कि वह वास्तव में कौन है? परमेश्वर सहायता करे कि हम सच्चे ईश्वरविज्ञान की पुनःस्थापना को देख सकें जहाँ पुरुषों और महिलाओं, लड़कों और लड़कियों का, परमेश्वर पुत्र के और परमेश्वर पवित्र आत्मा के सामर्थी अनुग्रह के माध्यम से परमेश्वर पिता के साथ पुनःस्थापित सम्बन्ध हो सके और वे अभी और सदैव के लिए फलदायी जीवन जीएँ।    

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया
क्रिस लार्सन
क्रिस लार्सन
क्रिस लार्सन (@ChristLarson) लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।