व्यवसायिक सफलता | लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
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व्यवसायिक सफलता

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का तीसरा अध्याय है: सफलता

चाहे पालन-पोषण, सम्बन्धों, या हमारे व्यवसायों के क्षेत्रों में, हम सभी सफलता के लिए यत्न करते हैं। व्यावसायिक सफलता अमेरिकी सपने के केन्द्र में है, जो सिखाती है कि यदि कोई पर्याप्त और लम्बे समय तक कड़ी परिश्रम करता है, तो वह अधिकांशतः सफल होगा। परन्तु हम एक विशिष्ट ख्रीष्टीय दृष्टिकोण से सफलता को कैसे मापते हैं? क्या इस आधार पर कि हम कितना पैसा कमाते हैं? हमारे पास कितनी वस्तुएं हैं? क्या यह उन लोगों की संख्या में है जो हमें सफल समझते हैं?

मत्ती 25:14-30 में, यीशु तीन सेवकों के दृष्टान्त को बताता है, जिनमें से पहले दो को विश्वासयोग्य पाया गया, परन्तु उनमें से अन्तिम को अविश्वासयोग्य घोषित किया गया। पहले दो विश्वासयोग्य थे, क्योंकि जब उनके स्वामी एक लम्बी यात्रा पर चला गया, तो सेवकों ने वह ले लिया जो स्वामी ने उन्हें सौंपा था और सावधानी से निवेश किया था। स्वामी के लौटने पर, उससे बहुत लाभ हुआ था। स्वामी प्रसन्न हुआ, और उसने उन्हें और भी अधिक सौंपा। परन्तु तीसरा सेवक न तो अपने स्वामी से प्रेम करता था और न उसका आदर करता था। आत्म-संरक्षण और अरुचि के कार्य में, उसने अपने स्वामी के धन को भूमि में छिपा दिया, और स्वामी के लौटने पर, उसने बिना निवेश किए गए धन को अपने स्वामी को लौटा दिया। सेवक अपने स्वामी से जो कहा, उससे पता चलता है कि सेवक न तो अपने स्वामी से सच्चा प्रेम करता था और न ही उसका आदर करता था, और इस प्रकार सेवक ने अपना समय और अपने स्वामी के भरोसे को गंवा दिया। स्वामी ने अविश्वासयोग्य सेवक को डाट लगाकर उसे बाहर निकाल दिया।

यह दृष्टान्त एक गम्भीर प्रश्न उठाता है: हम अपने स्वर्ग में विराजमान स्वामी से कितना प्रेम और उसका कितना सम्मान करते हैं? दृष्टान्त के अनुसार, इसका उत्तर उस रीति से मिलता है कि हम किस रीति से अपने स्वामी की उस प्रतिभा और धन से सेवा करते हैं जो उसने हमें सौंपा है। पहले दो सेवकों की सफलता इस तथ्य में नहीं पाई गई कि उनके काम का एक लाभदायक परिणाम निकला, किन्तु इस तथ्य में कि स्वामी ने उन्हें जो कुछ दिया था, वे उसके प्रति विश्वासयोग्य थे। यीशु ने निवेश के “जादुई शक्ति” के लिए नहीं किन्तु केवल विश्वासयोग्य होने के लिए उनकी प्रशंसा की। उनके लिए उसका आशीषवचन यह है जिसे हम सभी को उनकी पुनः आगमन के उस दिन सुनना चाहिए: “शाबाश, अच्छे और विश्वासयोग्य सेवक।” यीशु को हमसे यह कहते हुए सुनने से अधिक मीठा और क्या हो सकता है?

व्यावसायिक सफलता को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। परमेश्वर ने हमें कार्य करने और विश्राम करने दोनों के लिए बनाया। काम स्वाभाविक है। यह परमेश्वर की ओर से एक उपहार है, और यह परमेश्वर के स्वरूप में बनाए जाने के अर्थ के केन्द्र में है। परमेश्वर ने स्वयं कार्य किया और फिर उसने विश्राम किया। मनुष्य को, परमेश्वर के स्वरूप में सृजे गए एक विश्वासयोग्य बच्चे के रूप में, कार्य करना है और विश्राम करना है—सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिए (1 कुरिन्थियों 10:31)। सफलता कभी-कभी एक भ्रामक लक्ष्य इसलिए है क्योंकि मानव जाति के पाप में पतन से न केवल हमारे प्राण किन्तु हमारे शरीर और मन भी प्रभावित हो गए। हम अब उन बातों से प्रेम नहीं करते जिन्हें हम उस निर्दोषता और पवित्रता से प्रेम करने के लिए बनाए गए थे जिसे आदम ने पतन से पहले जाना था। जैसे परमेश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध पाप से प्रभावित हुआ, वैसे ही हमारा सम्बन्ध सृष्टि के क्रम से भी हो गया। पतन एक कठिन सम्बन्ध को लाया—जहाँ अब परमेश्वर की सृष्टि के फूलों के बीच ऊंट-कटारे उगते हैं। हमारी भौंहों से निकलने वाला पसीना प्रायः चिन्ता के साथ मिश्रित होता है, क्योंकि हमारा काम कई निराशाओं और कुण्ठाओं से भरा होता है। कभी-कभी हमारे परिश्रम की झुंझलाहट इतनी बड़ी लगती है कि यह कठिन है हम सभोपदेशक के उपदेशक के साथ हाथ न खड़े करें और घोषणा करें कि “सब कुछ व्यर्थ और वायु पकड़ने का प्रयासमात्र है” (सभोपदेशक 2:17)।

हमें यहाँ स्वयं को स्मरण दिलाने की आवश्यकता है कि हम बातों को वैसे न देखें—यहाँ तक कि सफलता को भी नहीं —जैसा कि संसार उन्हें देखता है। जब कि यह सत्य है कि हम जो कुछ भी करते हैं उसमें पतन का प्रभाव पाया जाता है, ख्रीष्ट का कार्य हमें छुड़ाता है और हमारे परिश्रम सहित सभी बातों पर हमारे दृष्टिकोण को बदल देता है। क्योंकि ख्रीष्ट ने पाप और मृत्यु पर विजय प्राप्त की है, उसने हमें नई सृष्टि बनाया है जिसकी पहचान, और सफलता, उसमें है। वेस्टमिन्स्टर अंगीकार हमें बताता है कि जहाँ तक हमारे भले कार्य परमेश्वर के प्रति विश्वास और आज्ञाकारिता में किए जाते हैं, वे उसे प्रसन्न करते हैं और उसे महिमा और सम्मान प्रदान करते हैं। परन्तु जो बात हमारे भले कार्यों को अन्ततः परमेश्वर को ग्रहणयोग्य बनाती है, वह यह है कि उन्हें “उसमें” स्वीकार किया जाता है (डब्ल्यू. सी. एफ. 16.6)। परमेश्वर हमारे भले कार्यों को देखकर प्रसन्न होता है, जिसमें वह कार्य भी सम्मिलित है जो हम अपने व्यवसायों में करते हैं, जैसे कि वह ख्रीष्ट में है, और जब वह ऐसा करता है, तो वह हमसे प्रसन्न होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इस जीवन में हमारा काम कभी भी सिद्ध होगा, परन्तु इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर की दृष्टि में यह सुखद और ग्रहणयोग्य है। इस प्रकार, हमारे लिए वास्तविक सफलता तब पाई जा सकती है जब हम यह अनुभव करते हैं कि केवल ख्रीष्ट में होने से ही हमारे द्वारा किया गया कुछ भी परमेश्वर को प्रसन्न करता है। इसलिए, क्योंकि हम ख्रीष्ट में हैं, हमारा कार्य “सूर्य के नीचे” छुड़ाया जाता है और परमेश्वर की दृष्टि में प्रसन्न करने वाला होता है। 

सुसमाचार के द्वारा ख्रीष्ट में हमारे छुटकारे की इस नींव पर, हम परमेश्वर को प्रसन्न करने वाले रीतियों से काम करने के प्रयास की सुन्दरता और महत्व का अनुभव करते हैं। परमेश्वर ने हमें केवल किसी बात से  नहीं छुड़ाया है; उसने हमें किसी बात के लिए  भी छुड़ाया है। इफिसियों 2:10 के अनुसार, “हम उसके हाथ की कारीगरी हैं, जो मसीह यीशु में उन भले कार्यों के लिए सृजे गए हैं जिन्हें परमेश्वर ने प्रारम्भ ही से तैयार किया कि हम उन्हें करें।” इसमें निश्चित रूप से हमारे व्यवसाय सम्मिलित हैं। परमेश्वर ने हमें ख्रीष्ट के स्वरूप में पुनः बनाया है और हमें इस प्रकार से कार्य करने की क्षमता प्रदान की है जो उसे प्रसन्न करता है।

प्रसिद्ध सब्त को मानने वाले स्कॉटिश प्रेस्बिटेरियन धावक एरिक लिडेल को यह कहने के लिए स्मरण किया जाता है, “परमेश्वर ने मुझे तीव्र बनाया। और जब मैं दौड़ता हूँ, तो मुझे उसके आनन्द का अनुभव होता है।” जबकि हम में से अधिकांश लोग कभीओलम्पिक में नहीं दौड़ेंगे, लिडेल ने जो कहा वह परमेश्वर के प्रत्येक व्यक्ति द्वारा कहा जा सकता है। परमेश्वर ने हमें खीष्ट यीशु में भले कार्यों के लिए सृजा है —जिसमें हमारे व्यवसाय भी सम्मिलित हैं— और जब हम अपनी क्षमताओं के अनुसार उन कार्यों को करते हैं, तो हमें परमेश्वर के आनन्द का अनुभव करना चाहिए। इस चित्रात्मक उदाहरण को लागू करते हुए, जो सबसे अधिक महत्व रखता है वह यह नहीं है कि क्या हम दौड़ जीतते हैं (पदोन्नति प्राप्त करते हैं, सबसे अधिक पैसा कमाते हैं, या सबसे बड़ा पद प्राप्त करते हैं), किन्तु यह कि हम अपनी परमेश्वर-प्रदत्त क्षमताओं के साथ सब बातों में उसे प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं जो हम करते हैं। हमें सबसे अधिक उन बातों से प्रसन्न होना चाहिए जो परमेश्वर को सबसे अधिक प्रसन्न करती हैं। सच्ची सफलता सरलता से मापी नहीं जा सकती। यह ऐसी सफलता नहीं है जिसे संसार मापता है। इसके विपरीत, यह उन छोटे-छोटे कार्यों को तब भी करना है जब कोई भी नहीं देख रहा है एक ऐसे रीति से जो प्रकट करता है कि हमारे पास सृष्टि के साथ एक उचित सम्बन्ध है, और इससे भी महत्वरूर्ण रीति से, सृष्टि के परमेश्वर के साथ भी।

बाइबल हमें बार-बार स्मरण दिलाती है कि केवल परमेश्वर ही हमारे कार्य को समृद्ध बना सकता है। केवल हमारे हाथों का बल या हमारी इच्छा शक्ति से सफलता नहीं आती है। चाहे हमारे व्यवसाय कलीसिया के भीतर हों या बाहर, केवल परमेश्वर ही वृद्धि प्रदान करता है। उसके सिद्ध रीति से बुद्धि से परिपूर्ण प्रावधान में, ऐसे समय होते हैं जब हम उसके आदर के लिए लगन से काम करते हैं, और फिर भी हम अपने परिश्रम का फल वैसा नहीं देखते हैं जैसा हम चाहते हैं। कई बार ऐसे भी समय होते हैं जब हम उतने अच्छे या विश्वासयोग्यता से काम नहीं करते जितना हमें करना चाहिए, और फिर भी परमेश्वर हमारे काम को समृद्ध करता है। यही कारण है कि हम केवल दृश्यमान परिणामों की मात्रा निर्धारित करके सफलता को नहीं माप सकते हैं। हमें बातों को उस रीति से देखने का प्रयत्न करना है जिस प्रकार से परमेश्वर उन्हें देखता है और उस रीति से बातों को मापने का प्रयत्न करना है जिस प्रकार से परमेश्वर उन्हें मापता है, सांसारिक बुद्धि से नहीं किन्तु आत्मा की बुद्धि से।

इस सम्बन्ध में, हमारा सारा कार्य, चाहे वह कुछ भी हो, राज्य के कार्य का एक पहलू है। हमारे सभी कार्य परमेश्वर के लिए आदर और महिमा को ला सकते हैं और देखने वाले संसार के सम्मुख हमारी ख्रीष्टीय साक्षी का एक पहलू बन सकते हैं। इस कारण से, ख्रीष्टियों को कठिन परिश्रम और अच्छी रीति से विश्राम दोनों करना चाहिए। दोनों महत्वपूर्ण हैं। यद्यपि परमेश्वर ने हमें कार्य करने के लिए सृजा है, उसने हमें केवल कार्य के लिए नहीं सृजा है। आदम का कार्य सप्ताह नियमित होना था छह दिनों के श्रम और एक दिन के विश्राम के साथ। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी संस्कृति में हम चरम पर चले गए हैं: हम या तो आलसी प्रथाओं में चले जाते हैं और अपने काम में परिश्रमी नहीं होते हैं, या हम काम के प्रति लती (वर्कहोलिक) बन जाते हैं जो कभी भी उस प्रकार से रुकते नहीं हैं जिस प्रकार से परमेश्वर ने रचा है। इनमें से कोई भी दृष्टिकोण बाइबलीय या स्वस्थ्य नहीं है। परिश्रम और विश्वास के साथ कार्य करने से बचना वास्तव में सृष्टि की सुन्दरता और साथ ही ख्रीष्ट में छुटकारे की महान सुन्दरता दोनों को नकारना है। अपनी सिद्ध बुद्धि में, परमेश्वर ने हमारे कार्य सप्ताह में सब्त के विश्राम को डाल दिया है। हमारे सब कुछ को विश्राम की आवश्यकता है। हमारे शरीर विश्राम करते हैं, परन्तु ऐसा ही हमारे प्राण भी करते हैं।

हम जो कुछ भी करते हैं उसमें परमेश्वर की महिमा करने और उसका आनन्द लेने के लिए हमारे प्रयास में, हमें इस संसार में अपने श्रम से नियमित रूप से विश्राम करने और स्वर्ग के धन्य विश्राम पर ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है। प्रभु के दिन विश्राम करने और आराधना करने से हमें सुखद, नया कर देने वाला स्वर्ग का पूर्वस्वाद मिलता है। विश्राम किए बिना काम करना ऐसा कार्य करना है जैसे कि हम पाप के श्राप से छुटकारे की आशा के बिना दोषी ठहराए गए दास हैं, जिस श्राप ने हमारे श्रम पर बोझ डाला है; और फिर भी विश्वासयोग्यता से काम करने से बचना एक कार्यात्मक अस्वीकृति है, कि हमें परमेश्वर के स्वरूप में बनाया गया है और पुनः परमेश्वर के स्वरूप में बनाया गया है। इस प्रकार हमारे व्यवसाय केवल अपने और अपने परिवारों के लिए प्रदान करने का एक साधन नहीं हैं; वे हमारी “प्रतिभाओं” को यथासम्भव विश्वासपूर्वक और लगन से उपयोग करने के अवसर हैं—सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिए।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
एरिक वॉटकिन्स
एरिक वॉटकिन्स
डॉ. एरिक बी. वॉटकिन्स, सेंट सैन मार्कोस, कैलिफ़ोर्निया में हार्वेस्ट ऑर्थोडॉक्स प्रेस्बिटेरियन चर्च के वरिष्ठ पास्टर हैं। वे प्राचार का घटनाचक्र (The Drama of Preaching) के लेखक हैं।