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आज के समय में सुसमाचार की विश्वासयोग्य सेवकाई में थकावट दिन-प्रतिदिन सामान्य होती जा रही है। कई कारणों से सेवकाई में लगे ईश्वरभक्त पास्टर और शिक्षक इस थकावट का अनुभव करते हैं। एक आक्रामक संसार की बढ़ती शत्रुता मनोबल को तोड़ने वाली और निराशाजनक हो सकती है। इससे भी बढ़कर, कुछ स्वयं को सुसमांचरवादी कहने वालों का बाइबल के बजाय संस्कृति से अधिक प्रभावित होने की प्रवृत्ति अत्यन्त हतोत्साहित करने वाली सिद्ध होती है। इन आत्मिक संघर्षों के साथ-साथ, कुछ अच्छे पुरुषों और स्त्रियों का स्वभाव इतना संवेदनशील होता है कि हर प्रकार के विरोध, चाहे छोटा हो या बड़ा, उन्हें अत्यधिक भारी प्रतीत होने लगने लगता है।
इस संक्षिप्त लेख में मैं उस दुःख और थकावट पर ध्यान केन्द्रित करना चाहता हूँ जिसने प्रभु यीशु ख्रीष्ट की पवित्र मनुष्यता को गहराई से प्रभावित किया। मैं यह नहीं कह रहा कि उसने सेवकाई के समयकाल में सेवकाई-थकावट का अनुभव किया। परन्तु पवित्रशास्त्र में हमारे उद्धारकर्ता को विश्वास के आदर्श पुरुष, प्रभु के उस सेवक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसका अनुकरण प्रत्येक सुसमाचार प्रचारक को करना चाहिए। इसे ध्यान में रखते हुए, मैं दो बातों पर ध्यान देना चाहता हूँ: पहला, हमारे निष्पाप प्रभु की कठिन, लगभग असहनीय सेवकाई सम्बन्धी परीक्षाओं के प्रायः उपेक्षित वास्तविकता को उजागर करना, और दूसरा, इन कठिनाइयों का सामना करते हुए यीशु के अटूट दृढ़ संकल्प को उजागर करना।
1. यीशु को स्मरण है और वह जानता है।
सबसे पहले, इन उल्लेखनीय शब्दों पर विचार करें:
उसने मुझ स कहा, “तू मेरा दास इस्राएल है, मैं तुझ में अपनी महिमा प्रकट करूंगा।” परन्तु मैंने कहा, “मैंने तो व्यर्थ परिश्रम किया, मैंने अपना बल व्यर्थ ही खो दिया है।” (यशायाह 49:3–4)
जब मैं पढ़ाता हूँ, तो प्रायः अपने विद्यार्थियों से पूछता हूँ, “ये शब्द किसने कहे?” आज तक किसी ने भी सही उत्तर नहीं दिया। ये शब्द यहोवा के विश्वासयोग्य, निष्पाप सेवक, ने कहे थे, वही जिसके द्वारा यहोवा की महिमा होगी। ये शब्द प्रभु यीशु ख्रीष्ट के मुख से निकले थे।
यह शब्द, “व्यर्थ,” अत्यन्त उद्बोधक हैं। इब्रानी भाषा व्यर्थता को हेवेल कहते हैं, यह शब्द सभोपदेशक की पुस्तक में बार-बार आता है: “व्यर्थ ही व्यर्थ।” क्रूस पर चढ़ाए जाने के निकट, जब हमारे उद्धारकर्ता ने अपने सेवकाई और मिशन का अवलोकन किया, तो उसने सेवकाई और व्यक्तिगत पीड़ा का एक ऐसा काल सहा, फिर भी उसने पाप नहीं किया। विरोध इतना निरन्तर था और उसके अपने शिष्य इतने मन्द और समझने में धीमे थे कि उसने भजनकार के उस शोक का पूरा भार अनुभव किया, जिसमें कहा गया है कि अन्धकार ही उसका एकमात्र साथी है (देखें: भजन संहिता 88:18)।
हर मसीही को यह जानना चाहिए, और हर सुसमाचार प्रचारक को यह अवश्य जानना चाहिए, कि हमारे पास एक ऐसा उद्धारकर्ता है जो अपने सेवकों के दुःख और थकावट को जानता है क्योंकि उसने स्वयं इसे अनुभव किया था। सुसमाचार की सेवकाई में विश्वासयोग्यता महँगी पड़ती है। भजनकार के इन शब्दों पर विचार करें जब वह पुकारता है:
हे मेरे प्राण, तू निराश क्यों है?
और भीतर ही भीतर तू व्याकुल क्यों? (भजन 42:5)
वह गहरे दुःख में इसलिए नहीं है क्योंकि उसने आज्ञा का उल्लंघन किया है, वरन् इसलिए है क्योंकि वह प्रभु के सेवक, यीशु ख्रीष्ट के अनुभव की पूर्वछाया देख रहा है।
मेरा मुख्य बिन्दु यह है: जब प्रभु के विश्वासयोग्य सेवक अपने आप को गहरे दुःख में पाते हैं, और जीवन और सेवा का जल उनके मन और हृदय पर उमड़ रहा होता है (भजन 69:1-2 देखें), तो उनके पास एक विश्वासयोग्य उद्धारकर्ता है जिसने घोर थकावट और गहरे दुःख के मार्ग पर चलकर देखा है। वह तुम्हारी दशा को जानता है, वह स्मरण रखता है, और वह जानता है कि तुम धूल ही हो (भजन 103:14)।
2. यीशु के विश्वास ने उसके कार्यों को निर्देशित किया।
दूसरा, अब इन आगे के शब्दों पर विचार करें:
फिर भी मेरा न्याय तो यहोवा के पास,
और मेरे परिश्रम का फल परमेश्वर के हाथ में ही है। (यशायाह 49:4)
प्रभु यीशु ख्रीष्ट, परमेश्वर का निष्पाप पुत्र, उसका विश्वासयोग्य सेवक, ने सेवकाई की कठिनाइयों और क्लेशों का सामना किया, फिर भी उसने अपने व्याकुल हृदय और मन को यहोवा की विश्वासयोग्ता में स्थिर रखा। दुःख और उदासी से घिरे होने के बाद भी उसने परमेश्वर की भलाई और उसके परिश्रम के प्रतिफल की प्रतिज्ञा पर अटूट विश्वास बनाए रखा। उसी प्रकार स्वर्गिय पिता की भलाई और प्रेम में विश्वास हमें भी जीवन के तूफ़ान का सामना करने और तब भी डटे रहने में सक्षम बनाएगा जब हमारी आत्मा चारों ओर से टूट रही हो।
प्रभु के कुछ अत्यन्त प्रिय सेवकों को अन्धकार में चलने के लिए बुलाया जाता है, यहाँ तक कि ऐसे अन्धकार में भी जहाँ प्रकाश का कोई अस्तित्व नहीं होता। यशायाह 50:10 के इन प्रभावशाली शब्दों पर विचार करें:
तुम में कौन है जो यहोवा का भय मानता हो, और उसके दास की बातों का पालन करता हो, जो प्रकाश के बिना अन्धकार में चलता हो? वह यहोवा के नाम पर भरोसा रखे और अपने परमेश्वर पर आशा लगाए रहे।
यशायाह के माध्यम से, प्रभु हमें यह समझाता है कि जब सेवकाई की थकान हमारे जीवन को नष्ट करने और प्रभु एवं उसकी कलीसिया की सेवा में अयोग्य बनाने की धमकी देती है, तब परमेश्वर को स्मरण करना ही हमें स्थिर बनाए रखता है।
यही हमारे उद्धारकर्ता का भी परम अनुभव था। जब वह कलवरी के क्रूस पर अकेले लटके हुए उसके चारों ओर सब कुछ अन्धकारमय हो गया, तब परमेश्वर में उसके विश्वास ने ही उसे हार मानने और पीछे हटने से रोका। अपनी पूर्ण निराशा में भी उसने परमेश्वर पर दृढ़ विश्वास बनाए रखा, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर…” (भजन संहिता 22:1; मत्ती 27:46; मरकुस 15:34)। अन्धकार ने उसे चारों ओर से घेर लिया था, परन्तु उसी अन्धकार में उसका विश्वास महिमा के साथ चमकता रहा।
निष्कर्ष
सेवकाई में थकावट के अनेक कारण हो सकते हैं: व्यक्तिगत संघर्ष, पारिवारिक तनाव, कलीसियाई समस्याएँ, राष्ट्रीय अशांति, और अंतर्राष्ट्रीय संकट। कारण चाहे जो भी हो, यीशु अपने लहू से खरीदे गए और अपने प्रिय प्रजा से कहता है: परमेश्वर पर विश्वास रखो— उस पिता पर जो तुम्हें अनन्त प्रेम से प्रेम करता है, उस पुत्र पर जिसने तुम्हारे लिए स्वयं को बलिदान किया और जो सदा तुम्हारे लिए मध्यस्थता करता है, और उस पवित्र आत्मा पर जो तुम्हारी सहायता के लिए तुममें वास करता है (यिर्मयाह 31:3; रोमियों 8:26; इब्रानियों 7:25)। परमेश्वर पर विश्वास रखो और उससे दृढ़ता से जुड़े रहो, ठीक वैसे ही जैसे हमारे उद्धारकर्ता ने किया था।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

