ख्रीष्ट में एक स्त्री की पहचान - लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
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ख्रीष्ट में एक स्त्री की पहचान

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का आठवां अध्याय है: अंगीकार करने वाली कलीसिया

ख्रीष्ट में एक बहन को अपनी पहचान के लिए लड़ते हुए देखने से अधिक कष्टदायक मेरे लिए और कुछ नहीं है। उसके संघर्ष प्रायः अन्य विकारों द्वारा छिपाए जाते हैं जैसे अवसाद, चिन्ता, भय, और खो जाने का एक सामान्य आभास। उसके आत्मिक जीवन के लिए युद्ध से होने वाली पूर्ण थकावट वास्तविक है। केवल विश्राम ही है जो उसे चाहिए, यद्यपि विश्राम ही है जो उसके पास पहले से ख्रीष्ट के साथ मिलन में है।

ऐसी कई स्त्रियाँ स्वयं को भटका हुआ पाती हैं और ऐसा आभास करती हैं जैसे वे समान ढूंढने वाले खेल के लिए गोल गोल दौड़ रही हैं। वह प्रायः विस्मरणशीलता के दबाव के आगे झुक जाती हैं और शत्रु द्वारा बुने छल के जाल में फंस जाती हैं (कुलुस्सियों 2:4)। वे जटिल रूप से बुने हुए झूठ हमें बताते हैं कि हम अपने पतियों, परिवारों, और मित्रों के लिए पर्याप्त नहीं हैं, अपने स्वयं के स्तर और अपेक्षाओं को बनाए रखने में असफल होने के बोझ को बढ़ाते हैं, और वास्तविक और काल्पनिक दोनों प्रकार की असफलताओं के अपराधबोध को थामे रखने का हमें कारण देते हैं। जैसे एक मकड़ी के जाल को हमारे व्यक्तियों से निकालना कठिन है, वैसे ही शत्रु का फन्दा कष्टप्रद रूप से हमारे हृदयों को पकड़े रहता है। ख्रीष्ट के पूरे किए कार्य के सत्य से इसे निकालने के लिए विशेष देखभाल और दृढ़ अनुशासन लगता है। हमारे उद्धारकर्ता हमारे हृदय के संघर्षों को जानता था, इसलिए उसने कहा,

हे सब थके और बोझ से दबे लोगो मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। मेरा जुआ अपने ऊपर उठा लो और मुझ से सीखो, क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ, और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे, क्योंकि मेरा जुआ सहज और मेरा बोझ हल्का है” (मत्ती 11:28-30)।    

धीरे-धीरे, हमें आज्ञाकारिता में आगे बढ़ना चाहिए, ऐसे हृदयों के साथ जो उसको प्रतिबिम्बित करे और उसमें विश्राम पाता है। विश्राम के माध्यम से धार्मिकता के लिए जीने का दैनिक कार्य हमें वैसे ही करने की आवश्यकता होगी जैसा एक बार मार्टिन लॉयड जोन्स ने कहा था: “अपने आपको सुनना बन्द करें और अपने आप से बोलना शुरु करें।“ हमें अपने आप से सत्य बोलना चाहिए (यूहन्ना 17:17)।

यह इस पहले सत्य को बोलने से आरम्भ होता है: मैं अपने पिता और अपने विश्वासयोग्य उद्धारकर्ता, प्रभु यीशु ख्रीष्ट का हूँ। किसी का होना अपने आप में शक्तिशाली है। परन्तु परमपरमेश्वर परमेश्वर का होना, जो एक सच्चा जीवित परमेश्वर और सब कुछ का रचने वाला, हमें शान्ति और आश्वासन देता है जो इस संसार का नहीं है। वास्तव में, यह इस संसार से बाहर का है। इफिसियों 1:3-14 ख्रीष्ट में उन लोगों द्वारा प्राप्त दानों को “स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक अशीषों” के रूप में बात करता है और बताता है कि हमारा त्रिएक परमेश्वर—पिता, पुत्र, और आत्मा—हमारे साथ अपने मिलन को सुरक्षित करने के लिए एक साथ कार्य करते हैं। यह सम्बन्ध (रोमियों 8:15), जो महान लाभों के साथ आता है, हमें एक प्रसिद्ध हृदय गीत की ओर ले जाता है, “मैं उसका हूँ और वह मेरा!” कोई भी उस सत्य को छीन नहीं सकता। यह एक भावना नहीं है जो क्षीण हो जाए या ऐसी कल्पना जो समय के साथ फीकी पड़ जाए। यह एक निश्चितता है जिसपर हम दृढ़ता से निर्भर हो सकते हैं। जबकि हम उस सत्य पर निर्भर होते हैं, हम ख्रीष्ट के जुए के नीचे सहारा लेते हैं और उसके द्वारा प्रदान किए गए अनुग्रह के साथ उसके लिए जीने का प्रयत्न करते हैं। जब हम अपने आप से यह सत्य बोलते हैं कि हम कौन हैं, हमारे हृदय और जीवन परिवर्तित हो जाते हैं। हमारे हृदय ऐसे स्थान बन जाते हैं जो उसके सुसमाचार के जीवित छायाचित्रों का प्रदर्शन करते हैं “जिससे परमेश्वर की महिमा की स्तुति हो” (इफिसियों 1:14)।

सम्भवतः यही कारण है कि हेडिलबर्ग धर्मप्रश्नोत्तरी का प्रथम प्रश्न एवं उत्तर इस सबसे-महत्वपूर्ण प्रथम सत्य को समाविष्ट करता है:

जीवन और मृत्यु में तुम्हारी एकमात्र सान्त्वना क्या है? कि मेरा शरीर और प्राण, जीवन और मृत्यु दोनों में, मैं स्वयं का नहीं परन्तु अपने विश्वासयोग्य उद्धारकर्ता यीशु ख्रीष्ट का हूँ जिसने अपने बहुमूल्य लहु से मेरे सभी पापों को सन्तुष्ट किया है, और मुझे शैतान की सामर्थ से छुड़ाया है और इस रीति से मुझे बनाए संरक्षित रखता है क्योंकि मेरे पिता की इच्छा के बिना, मेरे सिर का एक बाल भी नहीं गिर सकता, हाँ, कि सभी बातें मेरे उद्धार के लिए  सहायक होनी चाहिए, और इसलिए अपने पवित्र आत्मा से वह मुझे अनन्त जीवन की आशा भी देता है और इसके पश्चात् उसके लिए जीने के लिए मुझे निष्ठापूर्वक इच्छुक बनाता और तैयार करता है।                    

क्या आपने यह जानने का प्रतिफल सुना है कि आप हमारे महान त्रिएक परमेश्वर के हैं? सान्त्वना, धर्मीकरण, शैतान और उसकी सामर्थ से छुटकारा, आपके अनन्त उद्धार की महिमा तक सब वस्तुओं में संरक्षण, और यहाँ तक कि पवित्र आत्मा के माध्यम से उसके लिए अभी और सदैव के लिए जीने का स्वभाव। ये आत्मिक आशीषें ख्रीष्ट में हमारी पहचान की नींव तैयार करती हैं।

जब हमारे हृदय हमें धोखा देते हैं और हमें यह समझाने का प्रयास करते हैं कि अपने अपराध बोध पर अटके रहना, जो कि पहले से ख्रीष्ट पर डाल दिया गया है, थोड़ा भी स्वीकार्य है, तब हमें स्थिर रहना है। हमें इन सत्यों को पुनः स्वयं को सुनाना चाहिए। “अतः अब उन पर जो ख्रीष्ट यीशु में हैं दण्ड की आज्ञा नहीं। क्योंकि जीवन के आत्मा की व्यवस्था ने ख्रीष्ट यीशु में तुम्हें पाप और मृत्यु की व्यवस्था से  स्वतन्त्र कर दिया है” (रोमियों 8:1-2)। हम वास्तव में स्वतन्त्र हैं। आभारी, नम्र हृदयों के साथ, हम अपने उद्धारकर्ता के जुए और उसके होने का जो कुछ भी अर्थ है उसपर विश्राम करने के लिए स्वतन्त्र हैं। हमारी स्वतन्त्रता हमारे विश्राम को अपने सभी उत्तरदायित्वों में उसको जीवनदायी सेवा देने में परिवर्तित कर देती है: अपने पतियों और बच्चों से प्रेम करना, मित्र के द्वारा एक दूसरे को सुधारना, हमारे विकलांग बच्चे के लिए एक लड़ने वाला बनना, किसी ऐसे व्यक्ति के साथ रोना जो कष्ट में है, वृद्ध माता-पिता की देखभाल करना, और हाँ, जब हमारे हृदयों में तूफान प्रबल हो ख्रीष्ट पर दृढ़ता के साथ निर्भर होना। विश्राम हमारा है।

यह यीशु, जिसके हम हैं, हमारे जीवनों में कुछ भी व्यर्थ न होने देगा क्योंकि वह हमारे हृदयों को अपने समान नम्र हृदयों में परिवर्तित करता है, और वह सब कुछ जो हमें इस परिवर्तन के लिए आवश्यक है उसे प्रदान करने के लिए उतना ही विश्वासयोग्य है।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया

सुजैन स्मिथ बैनेट
सुजैन स्मिथ बैनेट
सुजैन स्मिथ बैनेट सैनफॉर्ड, फ्लोरिडा में सेंट एंड्रूज़ चैपल में महिला सेवकाई की संयोजक और द जोनाथन प्रोजेक्ट में परामर्शदाता हैं।