मसीही नृविज्ञान और नैतिक जीवन - लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ %
मनुष्य वाचा तोड़ने वाला और पुनःस्थापित स्वरूप-धारक है
5 सितम्बर 2023
हमारा सर्व-आधिकारिक सिर
12 सितम्बर 2023
मनुष्य वाचा तोड़ने वाला और पुनःस्थापित स्वरूप-धारक है
5 सितम्बर 2023
हमारा सर्व-आधिकारिक सिर
12 सितम्बर 2023

मसीही नृविज्ञान और नैतिक जीवन

मसीही लेखकगण कभी-कभी इस बात पर ध्यान देते हैं कि सिद्धान्त और नीतिशास्त्र एक साथ चलते हैं। जबकि ईश्वरविज्ञान के हर क्षेत्र के नैतिक निहतार्थ हैं, मनुष्य का सिद्धान्त (नृविज्ञान) नैतिक जीवन पर बड़ा प्रबल प्रभाव डालता है। हम कौन हैं यह इस बात से अभिन्न रीति से जुड़ा हुआ है कि हमें कैसे जीना चाहिए। इसके साथ-साथ, जिस प्रकार से परमेश्वर हमें कार्य करने के लिए बुलाता है वह उस मानव स्वभाव से मेल खाता है जिसे उसने हमें दिया है।

ऐसे दावे मसीही नीतिशास्त्र के विषय में लोगों के सोचने की विधि को चुनौती देते हैं। यहाँ तक कि कई मसीही भी परमेश्वर की व्यवस्था को ऐसे नियमों की सूची के रूप में देखने के लिए प्रलोभित होते हैं जिसे परमेश्वर ने हम पर थोपा है जो हमें आनन्द, सुख, और लाभ का आनन्द उठाने से रोकते हैं। परन्तु परमेश्वर की व्यवस्था मनमानी नहीं है। वह भले कारणों से हमें आज्ञा देती है। परमेश्वर की व्यवस्था न केवल उसके पवित्र और धर्मी स्वभाव को प्रतिबिम्बित करती है परन्तु हमारे स्वयं के स्वभाव को भी प्रतिबिम्बित करती है। उसकी नैतिक इच्छा हमारी सृष्टि की विधि से और हमारे लिए उसके उद्देश्यों से मेल खाती है जिन्हें प्राप्त करने हेतु हमें बनाया है। इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर की व्यवस्था सुखदाई वस्तुओं से हमें वंचित रखने का साधन नहीं हैं। परमेश्वर की व्यवस्था वास्तव में हमारे लिए भली है।

निस्सन्देह, पापी जगत में हमें प्रायः अपने प्रभु के प्रति विश्वासयोग्य होने के कारण दुःख उठाना होगा। परन्तु परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार जीना हमारी सृष्टि में उसके उद्देश्य से मेल खाता है और इसलिए जीवन की परीक्षाओं और हानियों के मध्य भी वह सच्ची सन्तुष्टि लाती है। परमेश्वर की व्यवस्था के विपरीत जीवन जीना मनुष्यों को दुखी और असन्तुष्ट बना सकता है, क्योंकि इस प्रकार का जीवन हमारी सृष्टि के अनुसार परमेश्वर के उद्देश्य के विपरीत होता है। एक पक्षी घोड़े के समान जीने में सन्तुष्टि नहीं पा सकता है, और एक घोड़ा मछ्ली के समान जीने में सन्तुष्टि नहीं पा सकता है। यह बात उन मनुष्यों के साथ भी है जो हमारा स्वभाव और हमारी नियति के लिए सटीक ईश्वरीय व्यवस्था के विरुद्ध जीने का प्रयास करते हैं।

आइए हम मानव नैतिकता के चार विवादास्पद क्षेत्रों पर ध्यान देते हुए इन बातों पर ठोस मनन करें: कार्य, शारीरिक लिंग (sex) और सामाजिक लिंग (gender), नस्लीय जाति (race), और मानव जीवन की बहुमूल्यता।

कार्य
भले ही हम घर के भीतर या घर से बाहर कार्य करें, भले ही हमारे कार्य से हमें आय प्राप्त हो या न हो, हम प्रायः कार्य में बहुत समय व्यतीत करते हैं। हम इसके विषय में केवल आवश्यकता पूर्ति के रूप में विचार कर सकते हैं—हमें विभिन्न भुगतान करने होते हैं, भोजन उपलब्ध कराना होता है, लंगोट (डायपर) बदलने पड़ते हैं। या फिर इसके विषय में हम नैतिक कर्तव्य के रूप में सोच सकते हैं कि हम परिश्रमी बनें और आलस न करें, जिसके लिए पवित्रशास्त्र हमें बारम्बार स्मरण दिलाता है (उदाहरण के लिए नीतिवचन 6:6–11; 1 थिस्सलुनीकियों 4:11–12; 2 थिस्सलुनीकियों 3:6–12)। आवश्यकता पूर्ति और नैतिक कर्तव्य, कार्य करने के लिए वैध प्रेरणा के स्रोत हैं, परन्तु इससे भी अधिक आधारभूत कुछ बात है। आरम्भ से ही, परमेश्वर ने मनुष्यों को कार्य करने वाले प्राणी होने के लिए सृजा। परिश्रम करना उस स्वभाव के अनुरूप है जो परमेश्वर ने हमें दिया है।

उत्पत्ति 1 के विषय में ध्यान आकर्षित करने वाली एक बात है कि यह परमेश्वर को कार्य करने वाले के रूप में वर्णित करता है। वह सब कुछ को अस्तित्व में लाता है, उन्हें सही क्रम में रखता है, उन्हें नाम देता है, और उन्हें कार्य देता है। परमेश्वर कोई आलसी आसक्त स्वेच्छाचारी नहीं वरन् एक परिश्रमी और फलप्रद श्रमिक है। इसलिए, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जब उसने मनुष्यों को अपने स्वरूप और अपनी समानता में सृजा, तो उसने तुरन्त उन्हें करने के लिए कार्य दिया: सब प्राणियों पर प्रभुता करने, फलने-फूलने, और पृथ्वी को भरकर अपने वश में करने का कार्य (उत्पत्ति 1:26, 28)। मनुष्य होने का अर्थ है परमेश्वर के स्वरूप को धारण करना, और परमेश्वर के स्वरूप को धारण करने का अर्थ है फलदायी परिश्रम करने की बुलाहट। परमेश्वर की व्यवस्था हमें कार्य करने की आज्ञा देती है क्योंकि यह मानव स्वभाव के अनुसार पूर्णतः सटीक है।

इससे हम समझ सकते हैं कि जो लोग किसी कारण से कार्य करना बन्द करते हैं, उनको क्यों हानि और विचलन का अनुभव होता है। जिन लोगों को विकलांग हो जाने के कारण कार्य छोड़ना पड़ता है प्रायः अवसाद से संघर्ष करते हैं। बहुत लोग जो उत्साह के साथ सेवानिवृत्ति के लिए प्रतीक्षा करते हैं, कार्य छोड़ने के कुछ ही समय बाद जीवन में अर्थ के अभाव का अनुभव करने लगते हैं। जब बच्चे बड़े होकर घर से निकल जाएँ तो समर्पित गृहणियों में उद्देश्यहीनता का आभास हो सकता है। कार्य के बिना जीवन दूर से, व्यस्तता और तनाव के मध्य तो आकर्षक लग सकता है, परन्तु वास्तव में खोखला निलकता है।

पिछले कुछ वर्षों में जब कोविड-19 और सरकार के नियमों ने आर्थिक जीवन में बाधा डाली तो संसार को बलपूर्वक इन वास्तविकताओं का सामना करना पड़ा है। कई कार्य समाप्त हो गए, और कई कार्य संकटपूर्ण और तनावपूर्ण बन गए। सरकार से प्राप्त पैसे और इन्टर्नेट के कार्यक्रम उत्पादक सेवाओं के लिए अनुपयुक्त प्रतिस्थापन प्रमाणित हुए। यह केवल संयोग नहीं है कि मानसिक अस्वस्थता और नशीले पदार्थों के उपयोग में बड़ी वृद्धि हुई है। अब सुनने में आता है कि वैश्विक महामारी के नियमों के हटने के पश्चात् भी, कार्य करने वालों की संख्या बढ़ी नहीं है। यह विशेषकर चिन्ताजनक बात है कि कार्य करने के लिए उपयुक्त उम्र वाले पुरुषों ने कार्य करना ही छोड़ दिया है।

ये केवल आर्थिक या सार्वजनिक नीति के विषय नहीं हैं, वरन् मानव अस्तित्व की आधारभूत बातों से जुड़े हुए विषय हैं। परमेश्वर ने हमें कार्य करने की आज्ञा दी क्योंकि उसने हमें एक ऐसा स्वभाव दिया जो कार्य करना चाहता है। जब लोग परिश्रम नहीं करते हैं, तो अवश्य ही इसके दुष्परिणाम बड़े होंगे।

शारीरिक लिंग और सामाजिक लिंग
जब मसीही लोग पाश्चात्य देशों में प्रचलित विचारधाराओं से स्वयं के बढ़ते हुए अलगाव पर विचार करते हैं, तो प्रायः उनके मनों में शारीरिक लिंग और सामाजिक लिंग के विषय होते हैं। कभी-कभी तो मसीही लोग सोच सकते हैं कि क्या पारम्परिक विचारों को थामे रहना वास्तव में सब उपहास और अलग किए जाने के योग्य है। परन्तु शारीरिक लिंग और सामाजिक लिंग बहुत महत्वपूर्ण हैं, और इसका एक प्राथमिक कारण यह है कि मानव प्रवृत्ति दाँव पर है। पिछले कुछ समय की शारीरिक लिंग और सामाजिक लिंग क्रान्ति परमेश्वर की व्यवस्था के प्रति विद्रोह और वास्तविकता का परित्याग है—उस वास्तविकता का जिसमें होकर परमेश्वर ने हमें सृजा।

यीशु ने एक बार कहा, परमेश्वर ने “आरम्भ ही से उन्हें नर और नारी बनाया” (मत्ती 19:4)। यीशु ने यह बात विवाह के विषय में सुसमाचारों में वर्णित सबसे लम्बी शिक्षा का परिचय देते समय कहा था (19:4-12; मरकुस 10:1-12 देखें)। उसने विवाह के स्थायित्व और अधिकांशतः विवाह-विच्छेदन की अनैतिकता के लिए केवल पुराने नियम से खण्ड उद्धृत नहीं किया। उसने यह भी दर्शाया कि शारीरिक लिंग और विवाह के लिए परमेश्वर की व्यवस्था सृष्टि के क्रम पर आधारित है। परमेश्वर अपेक्षा करता है कि हमारे बनाए जाने की विधि के कारण विवाह स्थायी, विश्वासयोग्य, प्रजननीय, और विषमलिंगी हो। हमारे विषय में पहली बात जो पवित्रशास्त्र हमें बताता है, वह यह है कि परमेश्वर ने हमें अपने स्वरूप में और अपनी समानता में बनाया (उत्पत्ति 1:26)। दूसरी बात यह है कि हम स्वरूप-धारक नर और नारी हैं (27 पद)। सब मनुष्य स्वरूप-धारक हैं, फिर भी स्वरूप-धारक होने की दो (और केवल दो) रीतियाँ हैं: और पुरुष या एक स्त्री के रूप में। यह आधारभूत भिन्नता हमारे जीवनों को सभी प्रकार से आकार देती है, कुछ स्पष्ट और कुछ रहस्यमय रीतियों में, परन्तु उत्पत्ति 2 सबसे महत्वपूर्ण रीति से बल देता है: परमेश्वर ने स्त्री को ऐसे सृजा जो सिद्ध रीति से पुरुष के लिए “उपयुक्त” थी (2:18) जिससे कि वे विवाह में जुड़ सकते थे, जो कि एक स्थायी और यौनसम्बन्धी फलदायी “एक देह” का सम्बन्ध है (22-24 पद)। केवल एक नर और एक नारी के मध्य का सम्बन्ध ही ऐसा हो सकता है।

अगली पीढ़ी को प्रशिक्षत करते समय इस प्रकार के विचारों पर बल देना अति महत्वपूर्ण है। हमारे बच्चों और किशोरों पर बहुत दबाव है कि वे शारीरिक लिंग के विषय में कलीसिया की शिक्षा को नकारें या कम से कम उसके महत्व को घटाएँ। उनके लिए यह कितना महत्वपूर्ण है कि वे जानें कि परमेश्वर ने हमारी इच्छाओं को दबाने के लिए और हमें दुःखी करने के लिए हम पर कठोर नियम नहीं लादे हैं। इसके विपरीत, लैंगिकता के विषय में उसकी व्यवस्था हमें दिखाती है कि हम सही अर्थ में मनुष्य कैसे हों। वह उस एक मार्ग का वर्णन करता है जिसमें हम अन्य मार्गों के समान दोष-बोध, पछतावा और घृणा के बिना अपनी यौनसम्बन्धी इच्छाओं को व्यक्त कर सकते हैं। अत्यधिक भोजन खाना, अत्यधिक पीना, और क्रोध के विस्फोट उस समय तो अच्छे लग सकते हैं, परन्तु अन्ततः व्यक्ति को (और अन्य लोगों को भी) बुरा ही लगता है। शारीरिक लिंग और सामाजिक लिंग के साथ भी ऐसा ही है। अपने सामाजिक लिंग को चुनना या बनाना कुछ समय के लिए शक्ति और स्वतन्त्रता का आभास दे सकता है। विवाह के सम्बन्ध के बाहर यौन इच्छाओं को पूरी करना कुछ समय के लिए प्रसन्नता दे सकती है। परन्तु ऐसा बातें कभी भी सन्तुष्ट नहीं कर सकती हैं, क्योंकि वे हमारी उस मानव प्रवृत्ति के विरोध में हैं जिसे हम वास्तव में नहीं बदल सकते हैं।

नस्लीय जाति
यह स्पष्ट है कि वर्तमान के समाज में नस्लीय जाति सामाजिक लिंग सबसे विवादास्पद विषयों में से हैं। परन्तु इस विषय के सम्बन्ध में मसीही स्वयं को समाज की प्रचलित विचारधारा के विपरीत नहीं पाते हैं, कम से कम सामान्य रीति से तो नहीं। जब समाज नस्लीय जातिवाद के प्रति विरोध की घोषणा करता है, तो मसीही लोग खुशी से उनके साथ जुड़ सकते हैं, और वे इस सम्बन्ध में कलीसिया की कमियों के लिए पछतावा भी व्यक्त कर सकते हैं। परन्तु नस्लीय जाति एक और नैतिक विषय है जो मानव स्वभाव से जुड़ा हुआ है। मसीही नृविज्ञानीय दृष्टिकोण से इस पर मनन करने पर अतिरिक्त अन्तर्दृष्टि मिलने की प्रतिज्ञा की गई है।

एक स्तर पर मसीही नृविज्ञान नस्लीय जातिवाद के प्रति एक बहुत सुस्पष्ट आपत्ति जताता है: परमेश्वर ने प्रत्येक मनुष्य को अपने स्वरूप और अपनी समानता में सृजा। त्वचा के रंग के कारण किसी से घृणा करना या वंशावली के कारण किसी को दबाना हमारे अस्तित्व के तथ्य को नकारता है और उस परमेश्वर का अपमान करता है जिसके स्वरूप में वे बनाए गए। भले ही बात को कितना ही समझाया जाए, नस्लीय जातिवाद कभी भी इस आपत्ति से नहीं बच सकता है। वैश्विक मानव गरिमा के आधार पर बहुत अ-मसीही नस्लीय जातिवाद का खण्डन करते हैं, परन्तु मसीहियों के पास ऐसा करने के लिए सबसे उत्तम कारण हैं।

फिर भी, मसीही नृविज्ञान माँग करता है कि हम और गहराई से विश्लेषण करें। पवित्रशास्त्र केवल यह संकेत नहीं करता है कि सब मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप को धारण करते हैं, परन्तु यह भी कि सब मनुष्य एक ही वंश के हैं। परमेश्व ने सब लोगों को “एक लहू” से बनाया (जैसा कि प्रेरितों के काम 17:26 का अनुवाद किया जा सकता है), जो जन्म के द्वारा एक वाचाई मुखिया, अर्थात् पहले आदम, के अधीन हैं, और जिनके पास एक और वाचाई मुखिया, अर्थात् अन्तिम आदम के अधीन उद्धार की एक ही आशा है (रोमियों 5:12–19; 1 कुरिन्थियों 15:21–22, 45–49)। हम सब एक समान स्वभाव को साझा करते हैं, और इस प्रकार से, पवित्रशास्त्र के अनुसार एक ही मानव जाति है। पवित्रशास्त्र स्वीकार करता है कि मनुष्य राष्ट्रों के रूप में एकत्रित हुए हैं (उदाहरण के लिए मिस्री, हित्ती, अश्शूरी, बेबिलोनी), परन्तु यह कहीं भी लोगों को उस रीति से विभिन्न “नस्लीय जातियों” में वर्णित नहीं करता है जैसा कि वर्तमान में किया जाता है। सीधी बात कहें तो, पवित्रशास्त्र में “गोरी” नस्लीय जाति, “काली” नस्लीय जाति, आदि जैसे कुछ भी नहीं है।

यह ध्यान देने योग्य है कि वर्तमान का अनुवांशिक विज्ञान भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है। जब वैज्ञानिक विश्व-भर से लोगों के अनुवांशिक रूप का अध्ययन करते हैं और उन लोगों के अनुवांशिक अवशेषों का अध्ययन करते हैं जो हम से बहुत पहले जीवित थे, तो वे इस विचार को नकारते हैं कि मानवता को विभिन्न जैविक नस्लीय जातियों में विभाजित किया जा सकता है। हम सब एक ही नस्ल के हैं और हम एक दूसरे से अत्यधिक सम्बन्धित हैं।
लोगों को अलग-अलग नस्लीय जातियों में विभाजित करना मनुष्यों का ऐसा कार्य है जो मानव स्वभाव की वास्तविकता के विरुद्ध है, भले ही बात को ईश्वरविज्ञानीय रीति से देखा जाए या वैज्ञानिक रीति से। लोगों को विभिन्न नस्लीय जातियों में विभाजित करना वैसा ही है जैसा कि नर और नारी से पृथक अन्य सामाजिक लिंगों का अविष्कार करना। शताब्दियों के नस्लीय जातिवाद के अन्याय का समाधान करने की विधि एक कठिन और विवादास्पद विषय है। यह बात समझने योग्य है कि मसीही लोग कभी-कभी इससे सम्बन्धित कुछ बातों में भिन्न निष्कर्षों पर पहुँचते हैं। परन्तु एक मसीही नृविज्ञान के अनुसार हमारा लक्ष्य एक ऐसा समाज और विशेषकर एक ऐसी कलीसिया होना चाहिए जिसमें हम एक-दूसरे से न तो ऐसा बोलेंगे और न ही ऐसा व्यवहार करेंगे जैसे कि हम भिन्न नस्लीय जातियों में से हैं।

मानव जीवन की बहुमूल्यता
अभी तक देखे गए सभी विषय महत्वपूर्ण हैं, परन्तु मानव जीवन की बहुमूल्यता उन सब से अधिक महत्वपूर्ण, या कम से कम सबसे आधारभूत है। प्रतिदिन हम एक दूसरे के प्रति विभिन्न स्तरों तक असंख्य त्रुटियाँ करते हैं। परन्तु एक सह/साथी मनुष्य को मारने से अधिक गम्भीर और भयानक बात और कोई नहीं है। यह उचित है कि हम इस विषय पर मनन करते हुए नैतिक जीवन के हमारे नृविज्ञानीय अध्ययन को समाप्त करें।

जब मैं अभी लिख रहा हूँ, विश्व भर के अधिकांश लोग यूक्रेन से आने वाले समाचारों और चित्रों से स्तम्भित हैं। स्वयं मैं तथा निश्चय ही इस लेख को पढ़ने वाले कई पाठक कभी भी युद्ध के मध्य में नहीं रहे हैं। यह एक बड़ी आशिष है, परन्तु यह हमें वास्तविकता के विषय में एक झूठा चित्र दे सकती है। हमारा पतित संसार एक हिंसक स्थान है। पाप इतना गहरा है कि लोग एक दूसरे की हत्या करते हैं, और प्रायः अनियन्त्रित और निर्लज्ज रीतियों से। हत्या, विशेषकर युद्ध में, न केवल व्यक्तिगत जीवनों को समाप्त करती है, परन्तु यह परिवार, समुदाय, अर्थव्यवस्था, और पर्यावरण को ध्वस्त करती है।

पिछले विषयों के ही जैसे, उत्पत्ति 1 पहले ही हमें बहुत कुछ बता देता है जिसे हमें जानना चाहिए। परमेश्वर ने “मनुष्य” को अपने स्वरूप में “नर और नारी” करके बनाया (उत्पत्ति 1:26-27)। इसलिए सब लोग सर्वाधिक गरिमा से युक्त हैं। किसी भी मनुष्य पर आक्रमण करने का अर्थ है परमेश्वर के स्वरूप पर आक्रमण करना। उत्पत्ति 9:6 इसमें एक नई और सूक्ष्म बात को जोड़ता है। महा जलप्रयल के बाद जो हिंसा के कारण हुआ था (6:11 देखें), परमेश्वर ने नूह के साथ और शेष इतिहास में सम्पूर्ण संसार से एक वाचा बाँधी, कि वह सब वस्तुओं को बनाए रखेगा और उन पर शासन करेगा (8:21-9:17)। इस वाचा के अन्तर्गत परमेश्वर ने घोषणा की: “जो कोई मनुष्य का लहू बहाएगा, उसका लहू मनुष्य द्वारा ही बहाया जाएगा, क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर ने अपने स्वरूप में बनाया है” (9:6)। इसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का लहू सामान्य रीति से बहुमूल्य है। जो कोई किसी अन्य व्यक्ति का लहू बहाए, उसको अपने लहू के द्वारा मूल्य चुकाना होगा। भले ही लहू बहाने वाला राजा हो और वह दास का लहू बहाए, या इसके विपरीत भी। मनुष्य का लहू तो मनुष्य का लहू है, और किसी भी व्यक्ति की हत्या के लिए उचित न्याय होना चाहिए। सबसे निर्बल और उपेक्षित लोगों के जीवन को भी बचाया जाना चाहिए। इससे हम गर्भपात की दुष्टता को समझ सकते हैं। अजन्मे लोगों से अधिक असुरक्षित और कोई नहीं है, और उत्पत्ति 9:6 का न्याय उनके लिए भी होना चाहिए।

इससे जुड़े हुए विषय के लिए उत्पत्ति 9:6 का सन्दर्भ ध्यान देने योग्य है। 5 पद में परमेश्वर कहता है कि वह स्वयं मनुष्य के बहाए गए लहू का बदला लेगा। परन्तु 6 पद कहता है कि परमेश्वर ने न्याय लागू करने के लिए मनुष्यों को अपना साधन नियुक्त किया है। यह तथ्य कि परमेश्वर इतने महान् कार्य को (पतित) मनुष्यों को सौंपता है यह इस बात की एक और साक्षी है कि हमारे पास एक अन्तर्निहित गरिमा है। परन्तु यह हमें यह भी स्मरण दिलाता है कि मानव जीवन को बहुमूल्य जानने का अर्थ है कि हमें वैधानिक प्रणालियों का, न्यायोचित्त (रक्षात्मक) युद्ध, और अन्य प्रणालियों का समर्थन करना चाहिए जो लोगों को हिंसा से बचाते हैं और अपराधियों को दण्डित करती हैं। परमेश्वर के स्वरूप को धारण करने का अर्थ है प्रभुता करने की बुलाहट को पूरा करना (1:26), और एक पतित जगत में इसका अर्थ है कि बुराई का सामना करने के लिए न्याय को बढ़ावा देना।
एक अन्तिम बात जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए, और यह सबसे महत्वपूर्ण बात है। हम विभिन्न उद्देश्यों को देखते आ रहे हैं कि परमेश्वर ने हमें क्यों बनाया, परन्तु सबसे बड़ा उद्देश्य था कि हम उसके साथ संगति में अनन्त धन्यता को प्राप्त करें। परमेश्वर ने हमें न केवल इस संसार पर राज्य करने के लिए परन्तु आने वाले संसार पर भी राज्य करने के लिए बनाया है (इब्रानियों 2:5)। यद्यपि हम उस लक्ष्य को पूरा करने में बुरी रीति से विफल हुए हैं, परमेश्वर ने हमारी तुच्छ स्थिति में अपने पुत्र को भेजा, जिससे कि एक दिन हम नई सृष्टि की महिमा में उसके साथ हो सकते हैं (5-10 पद)। परमेश्वर अपने सामान्य अनुग्रह से केवल हमारे वर्तमान के जीवन को बनाए ही नहीं रखता है जैसा कि उसने नूहाई वाचा में किया था, परन्तु वह नई वाचा के लहू के द्वारा हमें अनन्त जीवन भी प्रदान करता है। इसका अर्थ है कि भले ही हमारे वर्तमान का जीवन जितना बहुमूल्य हो, हम मसीही लोग इसको सबसे महत्वपूर्ण नहीं मानते हैं। हम अपना परित्याग करते हैं, अपना क्रूस उठाते हैं, और यीशु के पीछे चलते हैं (मत्ती 16:24)। हम “मृत्यु तक विश्वासयोग्य” हैं, यह जानते हुए कि ख्रीष्ट हमें “जीवन का मुकुट” देता है (प्रकाशितवाक्य 2:10)। किसी भी प्रकार का मसीही नृविज्ञान हमारी इस उत्तम नियति के बिना अधूरा है। आइए हम निश्चय ही “उसको पकड़ लें जो वास्तव में जीवन है” (1 तीमुथियुस 6:19)।

यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

डेविज वैनड्रूनन
डेविज वैनड्रूनन
डॉ. डेविज वैनड्रूनन कैलिफॉर्निया के वेस्टमिन्स्टर सेमिनेरी में विधिवत ईश्वरविज्ञान और मसीही नीतिशास्त्र के प्राध्यापक हैं, और ऑर्थोडॉक्स प्रेस्बिटेरियन चर्च में सेवक हैं। वह अनेक पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें पॉलीटिक्स आफ्टर क्रिसन्डम और डिवाइन कवनेन्ट एंड मोरल ऑर्डर सम्मिलित हैं।