यीशु की प्रार्थना का सन्दर्भ - लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
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यीशु की प्रार्थना का सन्दर्भ

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का दूसरा अध्याय है: यीशु की महायाजकीय प्रार्थना

यद्यपि यूहन्ना 17 में यीशु की प्रार्थना को पारम्परिक रूप से उसकी महायाजकीय प्रार्थना करार दिया गया है, वहीं अन्य लोगों ने इसे “प्रभु की प्रार्थना” कहा है, क्योंकि यीशु यहाँ सुसमाचारों में अभिलिखित सबसे लम्बी प्रार्थनाओं में से एक में लगा हुआ है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि, क्योंकि यूहन्ना का सुसमाचार में “प्रभु की प्रार्थना” सम्मिलित नहीं है—सम्भवतः बेहतर नाम होता “चेलों की प्रार्थना”—जिसे यीशु ने अपने चेलों को उनके निवेदन पर सिखाया था और मत्ती और लूका दोनों में सम्मिलित है (मत्ती 6:9-13; लूका 11:2-4)। इस तर्कसंगत धारणा पर कि यूहन्ना ने जब अपना सुसमाचार लिखा वह पहले के सुसमाचारों को जानता था, कोई यह अनुमान लगा सकता है कि, मत्ती और लूका में प्रकट प्रभु की प्रार्थना के स्थान पर, उसने यीशु के क्रूसीकरण से पूर्व उसकी अन्तिम प्रार्थना को लेखाबद्ध किया।

यह भी ध्यान दें कि यूहन्ना, यीशु की अन्तिम प्रार्थना के तुरन्त पश्चात्, एक “बाग” को सन्दर्भित करता है जिसमें यीशु और उसके चेलों ने किद्रोन नाले को पार करके प्रवेश किया, यीशु के रोमी सेना द्वारा पकड़े जाने के कुछ समय पहले (18:1-2)। हालांकि यूहन्ना बाग का नाम नहीं देता है, पर पहले के सुसमाचारों के पाठकों को यह अनुमान लगाने में कठिनाई नहीं होगी वह बाग गतसमनी था, जहाँ यीशु ने पकड़वाए जाने से ठीक पहले प्रार्थना की थी (मत्ती 26:36-46; मरकुस 14:32-42; लूका 22:40-46)। इन पहले के सुमाचारों में, हमें बताया गया है कि यीशु ने अपने पिता से तीन बार निवेदन किया, ”हे मेरे पिता, यदि यह मेरे पिए बिना नहीं टल सकता तो तेरी इच्छा पूरी हो” (मत्ती 26:39; 42; 44; मरकुस 14:36; 39, 41; लूका 22:42)। ऐसा प्रतीत होता है कि, यूहन्ना, उस रात्रि बाग में प्रवेश करने से पहले यीशु ने क्या प्रार्थना की, उस विषय में महत्वपूर्ण रूप से हमारे ज्ञान को और बढ़ाता  है।    

सन्दर्भ

प्रथम तीन सुसमाचारों में गतसमनी के बाग में यीशु की प्रार्थना का वर्णन यूहन्ना द्वारा वर्णित यीशु की अन्तिम प्रार्थना के वर्णन को आकर्षक ग्रन्थ-संग्रह सम्बन्धित (canonical) पृष्ठभूमि प्रदान करती है। परन्तु यूहन्ना के सुसमाचार में इसका सन्दर्भ क्या है? यूहन्ना ने अनिवार्य रूप से यीशु के विवरण को दो नाटकीय कृत्यों में विभाजित किया है, जिसे विद्वानों ने “चिन्हों की पुस्तक” (अध्याय 2-12) और “महिमा की पुस्तक” (अध्याय 13-21) नाम दिया है। कुछ प्रकार से, इसीलिए यूहन्ना के सुसमाचार के दोनों भागों को पढ़ना एक थिएटर के प्रदर्शन या फुटबॉल के खेल को मध्यान्तर के साथ देखने के समान है। पहले आधे भाग में, यीशु को अद्भुत चिन्हों की श्रृन्खला में संलग्न होने के लिए दिखाया है, यहूदी विवाह में पानी को दाखरस में परिवर्तित करने से लेकर (अध्याय 2) लाज़र नामक व्यक्ति को मरे हुओं में जिला देने तक (अध्याय 11)। हालांकि, दुखद रूप से, यहूदी राष्ट्र ने अपने मसीहा को अस्वीकार कर दिया था (12: 36-41)।  

जब यूहन्ना के सुसमाचार के दूसरे भाग का पर्दा खुलता है (या खिलाडियों का दल फिर से मैदान में आ जाता है), तो स्थिति स्पष्ट रूप से परिवर्तित हो जाती है। यीशु ने अब अपने बचे हुए विश्वासी अवशेषों को एकत्रित किया है—उसके बारह शिष्य, उसका नया मसीहाई समुदाय ( जिसे 13:1; 11:1 में “उसके अपने” कहा जाता है)—और यूहन्ना पुनरुत्थान के पश्चात, ऊँचे पर उठाए जाने के बाद के दृष्टिकोण को अपनाता है। इसीलिए यूहन्ना की “महिमा की पुस्तक” इस प्रकार से प्रारम्भ होती है (ध्यान दें कि अलग से दी गयी प्रस्तावना, 1:1-18 में परिचयात्मक प्रारम्भ को प्रतिबिम्बित करती है‌):

अब फसह के पर्व से पहिले, यीशु ने यह जानकर कि मेरी घड़ी आ पहुंची है कि मैं जगत को छोड़ कर पिता के पास जाऊँ, तो अपनों से जो संसार में थे जैसा प्रेम करता आया था उन से अन्त तक वैसा ही प्रेम किया . . . . . यीशु, यह जानते हुए कि पिता ने सब कुछ मेरे हाथों में दे दिया है, और यह कि मैं परमेश्वर के पास से आया हूँ और परमेश्वर के पास वापस जा रहा हूँ, भोजन पर से उठा (यूहन्ना 13:1-4)।

इसके बाद, प्रसिद्ध पैर धोने का दृश्य आता है, जिसमें यीशु ने अपने प्रेम को अपनों के लिए प्रतिरूपित किया, उस प्रेम को जिसे वह शीघ्र ही उनके पापों के लिए क्रूस पर मरते समय प्रदर्शित करेगा (19:30; 3:16 देखें)। इस प्रकार से, पैर धोना क्रूस के “विशेष पूर्वदर्शन” का कार्य करता है (13:1: “उसने उनसे अन्त तक वैसा ही प्रेम किया,” जिसमें “अन्त तक” का सम्भावित अर्थ “अन्तिम समय तक” और “सम्पूर्ण रीति से” दोनों ही है)।

यूहन्ना के सुसमाचार के अध्याय 13-17 लगभगपूर्ण रूप से अनोखे हैं और बारह प्रेरितों के साथ यीशु के अन्तिम भोज को दर्शाते हैं (ध्यान दें कि यूहन्ना समदर्शी सुसमाचारों (Synoptic Gospels) के पूर्व अनुमान के साथ स्पष्ट रूप से यीशु के अपनी देह और लहू में नयी वाचा की स्थापना का उल्लेख नहीं करता है, यद्यपि यूहन्ना 6 में जीवन की रोटी का प्रवचन सम्भवतः अन्तिम भोज का प्रतिबिम्ब हो सकता है)। केवल यहाँ हम यीशु के निकट के अनुयायियों के लिए विदा के निर्देशों को पाते हैं, जिसमें आने वाले पवित्र आत्मा के विषय में निर्देश (अध्याय14,16) और ख्रीष्ट के जाने के पश्चात् उसमें कैसे बने रहना है (अध्याय 15) इसके विषय के निर्देश सम्मिलित हैं। अध्याय 13-17 की समग्र संरचना (जिसे विदाई या अटारी का प्रवचन कहा जाता है), जो कि यूहन्ना के दुख-भोग के वर्णनन से पहले हैं, वह इस प्रकार से है। यूहन्ना 13:1-30 पैर धोने को विदाई प्रवचन और महिमा की पुस्तक को (अध्याय 18-21 में दुख-भोग वर्णनन सहित) एक प्रकार की विवरण प्रस्तावना के रूप में वर्णित करता है।

फिर, एक बार जब समुदाय शुद्ध हो जाता है और यहूदा पकड़वाने वाला कक्ष से चला जाता है (13:30), यीशु ग्यारहों को विदाई प्रवचन में निर्देश देता है जो कि 13:31 से 16:33 तक फैला है। यीशु के शब्द कभी-कभी उसके चेलों के प्रश्नों से बाधित होते थे (उदाहरण के लिए 13:36-37 [पतरस]; 14:5 [थोमा]; 8 [फिलिप्पुस], 22[दूसरा यहूदा]), यद्यपि अधिकान्श भाग कि लिए यीशु ही अपने अनुयायियों को उनके साथ उसकी शारीरिक उपस्थिति से पृथक जीवन के लिए तैयार करता है। निःसन्देह यीशु के अनुयायियों ने सोचा कि उनके प्रिय स्वामी को खोना अत्यन्त दुःखद होगा, फिर भी, यीशु उन्हें समझाने का प्रयास करता है कि यह वास्तव में उनके भले के लिए कार्य करेगा। एक बार जब वह दृश्य में से निकल जाएगा, तो वह —पिता के साथ मेल में —आत्मा को विश्वासियों में रहने के लिए भेजेगा। इस प्रकार से, यीशु के उनके स्थान होने के स्थान पर, आत्मा उन में होगा, जो उन्हें अपने मध्य और यहाँ तक कि उनके अन्तरतम में एक तीव्र और अत्यन्त शक्तिशाली परमेश्वरीय उपस्थिति की ओर प्रेरित करेगा।

निःसन्देह, नए नियम के विश्वासियों के रूप में, हम जिन्होंने ख्रीष्ट और हमारे स्थान पर क्रूस पर उसकी मृत्यु पर अपना विश्वास रखा हमने व्यक्तिगत रूप से पवित्र आत्मा के परिपूर्णता का अनुभव किया है, परन्तु अटारी के कक्ष में चेलों के लिए, आत्मा की सेवकाई की परिपूर्णता अभी भी भविष्य की बात थी। यहाँ, हम यीशु को पहले मसीही पिन्तेकुस्त के दिन क्या होने वाला है यह बताते हुए देखते हैं (प्रेरितों के काम 2; यूहन्ना 2:22 देखें, जहाँ यीशु अपने पीछे चलने वालों को आदेश देने के समय इस वास्तविकता को प्रारम्भिक समय की रीति के अनुसार कार्यान्वित करता है)। यीशु अपने क्रूसीकरण पर चेलों के अस्थायी शोक के अनुभव को एक स्त्री के जन्म देने के अनुभव, जो कि अल्पावधि में कष्टदायी है, वही पीड़ा शीघ्र ही आनन्द देती है जब बच्चा जन्म लेता है (16:16-33)  के चित्रण के साथ अपने निर्देशों को समाप्त करता है। उसी प्रकार, चेले भी यीशु की मृत्यु पर थोड़े समय के लिए शोक करेंगे परन्तु शीघ्र ही वे अति आनन्दित होंगे जब वे उसे मृतकों में से जी उठा देखेंगे।

इसके साथ, यीशु समाप्त करता है, “ये बातें मैंने तुमसे कहीं हैं, कि तुम मुझमें शान्ति पाओ। संसार में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु साहस रखो, मैंने संसार को जीत लिया है” (16:33)। इस प्रकार से, यीशु आने वाले क्लेश को और संसार और शैतान “इस संसार के अधिकारी” (12:31; 14:30; 16:11) पर पूर्वानुमानित अपनी विजय को देखते हुए अपने अनुयायियों को आश्वस्त करता है।

स्वयं में प्रार्थना

नए नियम में, यह मुख्य रूप से इब्रानियों की पुस्तक है जो कि यीशु के महायाजकीय भूमिका को बताती और विस्तारित करती है। नया नियम समग्र रूप से यीशु को नबी, याजक, और राजा के रूप में तीन भूमिकाओं में दर्शाता है। अपने नबी के कार्यभार सम्बन्ध में, यीशु एक नबी के रूप में कार्य करता है, जब वह यूहन्ना के सुसमाचार में लिखित (2:13-22) पहले फसह के पर्व पर यरुशलेम में अपनी पहली यात्रा में मन्दिर को शुद्ध करता है। भजनकार के चित्र को ध्यान में रखते हुए, यीशु को परमेश्वर की महिमा और और लोगों की आराधना की पवित्रता के लिए उस्ताह से भरे दिखाया है (यूहन्ना 2:17; देखें भजन 69:9)। मन्दिर यीशु के “पिता का घर” है (यूहन्ना 2:16; देखें लूका 2:49), वह स्थान जहाँ वह—मसीहाई दूल्हा (यूहन्ना 3:9)— अपने जाने के पश्चात् अपने अनुयायियों के लिए स्थान तैयार करने जाएगा (14:2-3)।

साथ ही, जब लोग यीशु द्वारा पाँच हज़ार को भोजन कराते हुए दिखाए गए मसीहाई चिन्ह को देखते हैं, वह “मूसा समान नबी” (व्यवस्थाविवरण 18:15-19) के आगमन की अपेक्षा को ध्यान में रखते हुए कहते हैं,  “सचमुच यह वही नबी  है जो जगत में आने वाला था” (6:14, बल दिया गया है)। परन्तु, ध्यान दें, कि मन्दिर को शुद्ध करते समय, यीशु को अस्वीकार किया जाता है और वह यहूदी राष्ट्र पर न्याय सुनाता है, और जब उसकी “नबी जो जगत में आने वाला था” के रूप से पहचान की जाती है, वह निकल जाता है, “यह जानकर कि वे उसे बलपूर्वक राजा बनाने के लिए ले जाना चाहते हैं” (यूहन्ना 6:14-15)। इसीलिए, जिस प्रकार यूहन्ना यीशु के विषय में गलील में उसके एक मसीहाई चिन्ह के प्रदर्शन से पूर्व टिप्पणी करता है, “नबी अपने देश में आदर नहीं पाता” (4:44; देखें मत्ती 13:57; मरकुस 6:4; लूका 4:24)। इसलिए, यूहन्ना के सुसमाचार में, यीशु वास्तव में एक नबी है, परन्तु वह जिसे यरूशलेम में यहूदी अधिकारियों और उत्तरी गलील में अपने स्वयं के द्वारा अस्वीकार कर दिया गया है।

यीशु के राजा की भूमिका के सम्बन्ध में, हमने अभी देखा कि, पाँच हज़ार लोगों के खिलाए जाने के ठीक पश्चात्, लोग यीशु को बलपूर्वक उनका राजा बनने के लिए बाध्य करने वाले थे (यूहन्ना 6:15)। बाद में, क्रूसीकरण के ठीक पूर्व यरूशलेम में उसके विजय प्रवेश में, यीशु एक गदहे पर बैठ कर सुलैमानी रीति में (12:12-19;  देखें 1 राजा 1:38), राजसी विनम्रता के प्रतीक के रूप में (12:14) और पुराने नियम के नबी जकर्याह की भविष्यद्वाणी “हे सिय्योन की बेटी, मत डर! देख, तेरा राजा गधे के बच्चे पर बैठा हुआ चला आता है” (पद 15; देखें जकर्याह 9:9) की पूर्ति में नगर में आता है। यहूदी राष्ट्रीयता के भाव में खजूर की डालियाँ हिलाते हुए— निकट के यरीहो को “खजूर के नगर” के रूप में जाना जाता था, और खजूर की डालियाँ यहूदी राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक थीं—बड़ी भीड़ उससे मिलने आती है और पुकारती है: “होशन्ना! धन्य हैं वह जो प्रभु के नाम से आता है अर्थात् इस्राएल का राजा” (यूहन्ना 12:13)।

और फिर भी, जिस प्रकार से लोग यहाँ यीशु की उनके राजा के रूप में जयजयकार कर रहे हैं, शीघ्र ही इसके बाद यही भीड़ यीशु की निन्दा में यहूदी अधिकारियों के साथ जुड़ जाती है। जब पिलातुस यीशु को सुनवायी के पश्चात् उनके सामने यह कहते हुए प्रस्तुत करता है,”देखो, तुम्हारा राजा!” वे चिल्लाकर कहते हैं, “ले जा, ले जा, इसे क्रूस पर चढ़ा!” (19-14-15)। और जब पिलातुस ने प्रत्युत्तर दिया, “क्या मैं तुम्हारे राजा को क्रूस पर चढ़ाऊँ?” महायाजकों ने तुरन्त उत्तर दिया, “कैसर को छोड़ हमारा कोई राजा नहीं” (पद 15)। “दोषी” ठहराने के निर्णय के पश्चात्, पिलातुस के पास एक त्रिभाषीय दोष पत्र था जिसपर लिखा था, “यीशु नासरी, यहूदियों का राजा,” और उसे क्रूस पर लगा दिया, जो कि यीशु के विरुद्ध दोष को दर्शाता था (पद 19)। यहूदी अधिकारी, जो कि अभी भी सन्तुष्ट नहीं होते हैं, रोमी शासक द्वारा अभिलेख में परिवर्तन लाने का प्रयास करते है कि उस पर लिखा हो “उसने कहा, ‘मैं यहूदियों का राजा हूँ’,” परन्तु पिलातुस ने उन्हें अनदेखा कर दिया (पद 21-22)। इस प्रकार, एक गहरी और दुखद विडम्बना में, पिलातुस ने वह स्वीकार किया जिसे यहूदियों ने अस्वीकार किया—राजा के रूप में यीशु की भूमिका। जिस प्रकार से यीशु लोगों के अस्वीकार किए जाने के बाद भी सच्चा नबी है, उसी प्रकार से उनके अस्वीकार करने के बाद भी वह वास्तव में उनका राजा है।

यूहन्ना के सुसमाचार में यीशु का याजकीय कार्यभार को स्पष्ट रूप से उस सीमा तक विकसित नहीं किया गया है जिस सीमा तक उसकी नबी और राजा की भूमिका है। तब भी, क्रूस पर उसकी मृत्यु को बलिदान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह “परमेश्वर का मेमना” जो “जगत के पाप उठाने के लिए” मरा (1:29; 36)। वह “अच्छा चरवाहा” है जो अपनी “भेड़ो” के लिए अपना प्राण दे देता है (10:15; 17-18)। उस वर्ष के यहूदी महायाजक के रूप में, काइफा ने उचित ही—यद्यपि अनजाने में—नबूवत की थी कि, यीशु वह “एक व्यक्ति” है जो लोगों के पापों के लिए मरा; जिससे, न केवल यहूदी लोगों को, परन्तु अन्यजातियों को भी उद्धार प्रदान किया जा सके (11:50-52; देखें 10:16)। इस याजकीय,मध्यस्थता के कार्य को करने के द्वारा—विरोधाभास रूप से महायाजक और सिद्ध बलिदान दोनों के रूप में कार्य करके—वह यीशु ही था जिसने महायाजक के रूप में कार्य किया यद्यपि काइफा औपचारिक रूप से उस कार्यभार को धारण किए था।

साथ ही, यीशु के मिशन के यूहन्ना के वर्णन में फसह का विषय निरन्तर जुड़ा हुआ है, जो कि दर्शाता है कि यीशु ने मिस्र में बन्धुवाई से इस्राएल के निर्गमन और छुटकारे के संयोजन के साथ फसह के प्रतीकवाद को पूरा किया। इसी प्रकार से, यूहन्ना ने निस्सन्देहः पौलुस की घोषणा को दोहराया होगा कि, “हमारे फसह का मेमना, ख्रीष्ट भी बलिदान हुआ है” (1 कुरिन्थियों 5:7)। इन सब प्रकार से, यूहन्ना यीशु को लोगों द्वारा अस्वीकार करने के बाद भी सच्चे नबी, याजक, और राजा के रूप में प्रस्तुत करता है। वास्तव में, नबी, याजक, और राजा के रूप में लोगों की अस्वीकृति उसके मसीहाई मिशन का एक अत्यावश्यक भाग था (देखें यूहन्ना 12:38-41)। यह इसी ढांचे के भीतर है कि यूहन्ना ने यीशु को उसकी अन्तिम प्रार्थना कहते हुए दिखाया जहाँ वह सर्वप्रथम अपने लिए मध्यस्थता करते हुए दिखाया गया (17:1-5), फिर अपने अनुयायियों के लिए (17:6-19), और अन्त में उनके लिए जो उसके प्रथम अनुयायियों की साक्षी के द्वारा विश्वासी बनेंगे (17:20-26)।

यीशु का व्यवहार

अपनी प्रार्थना के आरम्भ से ही यीशु की मुद्रा—जो कि यूहन्ना के विदाई प्रवचन की समाप्ति करता है—न केवल पापहीनता  से परन्तु निस्वार्थता  से भी चिन्हित किया जाता है। आश्चर्यजनक रूप से, अपने अन्तिम घड़ी में, यीशु न केवल अपने मसीहाई मिशन को पूरा करने के लिए चिन्तित है परन्तु अपने अनुयायियों के आत्मिक कल्याण और भविष्य के मिशन के लिए भी चिन्तित है। इसमें, वह मध्यस्थ की याजकीय मुद्रा को धारण करता है। वह “उन सब को जिन्हें तू [परमेश्वर] ने उसे दिया है अनन्त जीवन देने” के लिए चिन्तित है, जो कि एकमात्र सच्चे परमेश्वर और यीशु ख्रीष्ट को जानना है जिसे उसने भेजा है (यूहन्ना 17:2-3)। वह स्वयं के लिए महिमा प्राप्त करने के स्थान पर पिता की महिमा लाने के लिए भी चिन्तित है (पद 4-5)।

यीशु लेने  के लिए नहीं—अपने ही उद्देश्य को पूरा करने या अपनी महानता बढ़ाने के लिए—परन्तु देने  के लिए आया था: खोए हुए पापियों को अनन्त जीवन देने और उस पिता को महिमा देने के लिए जिसने उसे उस जीवन देने के मिशन पर भेजा था। दूसरों के सम्बन्ध में, जैसा कि पहले से पैर धोने के समय प्रदर्शित हो चुका है; यीशु विश्वासियों के लिए एक उदाहरण के रूप में कार्य करता है (यूहन्ना 13:15-16;देखें फिलिप्पियों 2:1-11)। यीशु की “नयी आज्ञा” के अनुसार, हमें एक दूसरे से वैसा प्रेम करना है जैसा कि उसने हमसे किया (यूहन्ना 13:34-35)। यीशु का औरों के लिए निस्वार्थता और सर्वोच्च परवाह का उदाहरण—उसका औरों के लिए स्वयं को दे देने वाला असीमित प्रेम—एक ऐसे संसार में अत्यन्त कायलता को प्रमाणित करता है जहाँ स्व-बढ़ाई और स्वार्थ दिन के क्रम हैं, यहाँ तक कि स्वयं को मसीही स्वीकार करने वालों के भी।

यीशु को इस बात की भी चिन्ता है कि पिता उन लोगों को जिन्हें उसे सौंपा गया है एक ऐसे संसार में आत्मिक रूप से सुरक्षित रखे जो कि उसे और उन लोगों दोनो से घृणा करता है: “अपने नाम से जो तू ने मुझे दिया है, इनकी रक्षा कर कि जैसे हम एक हैं, वे भी एक हों” (यूहन्ना 17:11)। चेले इस संसार में हैं पर इस संसार के नहीं (पद 11, 14 16)। यीशु ने उन्हें पहले ही परमेश्वर का वचन दे दिया है (पद 14) और शीघ्र ही वह अपना आत्मा भेजेगा। उसकी प्रार्थना यह नहीं है कि पिता विश्वासियों को इस संसार से बाहर निकाल दे परन्तु जब तक वह संसार में रहें वह उन्हें दृढ़ करे—कि “वह उन्हें दुष्ट से बचाए रखे” (पद 15)। इसलिए, उसकी प्रार्थना परमेश्वर के वचन के सत्य के माध्यम से  विश्वासियों के अभिषेक के लिए—उनके पवित्रीकरण के लिए है (पद 17)।

इसके अतिरिक्त, उनका पवित्रीकरण स्वार्थी उद्देश्यों के लिए नहीं है ताकि वे अपनी पवित्रता का आनन्द ले सकें। नहीं, यह मिशन के उद्देश्य के लिए है (यूहन्ना 17:18)। पवित्रीकरण के इस मिशनरी उद्देश्य को प्रायः अनदेखा कर दिया जाता है, जो कि अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि न केवल पवित्रीकरण का परिणाम मिशन में होना चाहिए, परन्तु, इसके विपरीत, मिशन पवित्र लोगों द्वारा पूरा किया जाना चाहिए—ऐसे लोग जिनमें आत्मा वास करता है और जो परमेश्वर के वचन के प्रति आज्ञाकारी हैं, और ऐसे लोग जो एक दूसरे से प्रेम करते हैं और ख्रीष्ट के प्रति अपनी एक समान निष्ठा और संसार के लिए मिशन में उनके उद्देश्य के लिए एक हैं (पद 20-26; देखें इफिसियों 4:1-6)। विश्वास करने वाले समुदाय का संगठित मिशन, यीशु के आत्मा द्वारा सुदृढ़-एक दूसरे के लिए बनाया गया प्रेम, इसीलिए यूहन्ना 17 में यीशु की अन्तिम प्रार्थना का अन्तर्निहित दर्शन है।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
ऐन्ड्रियास जे. कोस्टेनबर्गर
ऐन्ड्रियास जे. कोस्टेनबर्गर
डॉ. ऐन्ड्रियास जे. कोस्टेनबर्गर कैन्ज़स सिटी, मिज़ोरी में मिडवेस्टर्न बैप्टिस्ट थियोलॉजिकल सेमिनेरी में नए नियम और बाइबलीय ईश्वरविज्ञान के अनुसंधान प्राध्यापक तथा बाइबल अध्ययन केन्द्र के निर्देशक हैं। वे कई पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें सुसमाचारों का यीशु (The Jesus of the Gospels) और इब्रानियों से प्रकाशितवाक्य पर हस्तपिस्तिका (Handbook on Hebrews Through Revelation) सम्मिलित हैं।