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सुसमाचार का क्या अर्थ है?

बहुत से मसीही, कलीसियाए और संस्थाए अपने विश्वास का वर्णन करने के लिए नियमित रीति से सुसमाचार  शब्द का उपयोग करते हैं। सुसमाचार के अर्थ पर एवं कौन इसे विश्वासयोग्यता के साथ प्रचार करता है, ईश्वरविज्ञानीय विवाद हुए हैं और होते हैं। उस परिचित शब्द सुसमाचार  का क्या अर्थ है? उस प्रश्न का उत्तर देने के लिए सबसे सही मार्ग है, बाइबल के पास जाना।

यूनानी भाषा के नए नियम में, संज्ञा यूआंग्लियोन (“सुसमाचार”) लगभग सत्तर से अधिक बार आया है। क्योंकि, एक अर्थ में, पूरा नया नियम सुसमाचार के विषय में है, हमें यह अपेक्षा कर सकते थे कि इस शब्द का उपयोग अधिक बार किया गया होगा। और भी आश्चर्यजनक रूप से, इसका उपयोग नए नियम की पुस्तकों के लेखकों में भिन्न रीति से किया गया है। जितनी बार शेष लेखक मिलाकर इस शब्द का उपयोग करते हैं, पौलुस इसे तीन से अधिक बार करता है। इसके शेष अधिकांश उपयोग मत्ती और मरकुस में पाए जाते हैं, तथा बहुत कम यदि कोई हैं तो, लूका, यूहन्ना, पतरस और याकूब में हैं।

सुसमाचार  शब्द का साधारण अर्थ “अच्छा सन्देश” है। यह शब्द मसीही सन्देश में अनोखा नहीं है, परन्तु इसका उपयोग गैर मसीहियों में भी अच्छी उद्घोषणा के लिए किया जाता था। नए नियम में यह उद्धारकर्ता यीशु के अच्छे सन्देश को सन्दर्भित करता है। प्रायः इसे इस धारणा के साथ उपयोग किया जाता है कि पाठक इस शब्द के अर्थ को जानता है।

जब हम नए नियम में सुसमाचार  के उपयोग करने के प्रकारों को और ध्यान से देखते हैं, कई बिन्दु दृढ़ता से सामने आते हैं। पहला, अधिकतर हम एक वाक्यांश पाते हैं  “परमेश्वर का सुसमाचार।” यह वाक्यांश सुसमाचार के स्रोत पर बल देता है कि यह परमेश्वर का एक उपहार है। सुसमाचार का स्रोत परमेश्वरीय है, मानवीय नहीं। दूसरा, सुसमाचार की विशेषता को अनेक रीतियों से दर्शाया गया है। सुसमाचार सच्चा है (गलातियों 2:5; 14; कुलुस्सियों 1:5), अनुग्रहपूर्ण है ( प्रेरितों के काम 20:24), और महिमामय है (2 कुरिन्थियों 4:4; 1 तीमुथियुस 1:11)। तीसरा, हम सुसमाचार के प्रति दो प्रतिउत्तर देखते हैं। मुख्य प्रतिउत्तर विश्वास है (प्रेरितों के काम 15:7; इफिसियों 1:13)। परन्तु आज्ञाकारिता भी एक प्रतिउत्तर है (1 पतरस 4:7; रोमियों 1:5; 10:16; 16:26; 2 थिस्सलुनीकियों 1:8)।

(पौलुस द्वारा रोमियों में विश्वासियों की आज्ञाकारिता के विचार के उपयोग में विडम्बना का एक तत्व है क्योंकि वह उन लोगों को प्रतिउत्तर देता है जिन्होंने उस पर व्यवस्था-विरोधी (antinomianism) होने को दोष लगाया था)। चौथा, हम सुसमाचार के अनेक परिणाम को देख सकते हैं। निस्सन्देह, सुसमाचार उद्धार लाता है (रोमियों 1:16; इफिसियों 1:13)। यह राज्य को भी लाता है (मत्ती 4:23; 9:35; 24:14)। यह परमेश्वर के लोगों में एक आशा को उत्पन्न करता है (कुलुस्सियों 1:23)। सुसमाचार पवित्रीकरण के लिए एक प्रेरणा भी है (मरकुस 8:35; 10:29; 2 कुरिन्थियों 9:13; इफिसियों 6:15; फिलिप्पियों 1:27)।

सुसमाचार  शब्द के उपयोग के ये सब प्रकार उसके विषय वस्तु की ओर संकेत करते हैं, परन्तु नए नियम में ऐसे भी खण्ड हैं जो उसकी विषय वस्तु के अनुसार स्पष्ट हैं। इन खण्डों का अध्ययन करने में, हम पाते हैं कि कभी-कभी सुसमाचार  शब्द बड़े रूप में उद्धार के सभी पहलुओं को और नया जीवन को प्रदर्शित करता है जो यीशु अपने लोगों को देता है। और कभी-कभी इसका उपयोग सकरे रीति से इस बात के लिए किया जाता है कि यीशु हमारे लिए हमारे बाहर क्या करता है। दूसरे शब्दों में, कभी-कभी सुसमाचार  बड़े स्तर पर यीशु का अपने लोगों के लिए और उनके भीतर धर्मी ठहराए जाने और पवित्रीकरण के कार्य को प्रकट करता है, और कभी-कभी यह केवल धर्मी ठहराए जाने को सन्दर्भित करता है। इस भिन्नता को रखने का दूसरा रूप यह है कि, कभी-कभी सुसमाचार  शब्द बड़े रूप में पुराने नियम की सभी प्रतिज्ञाओं को नए नियम में परिपूर्णता को दिखाता है और कभी-कभी सुसमाचार  का उपयोग सकरे रीति से हमारी व्यवस्था को करने के विपरीत यीशु का उसका पूरा करने के लिए किया जाता है।

सुसमाचार  शब्द के सामान्य अर्थ का एक उदाहरण मरकुस 1:1 में देखा जा सकता है, “परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह के सुसमाचार का आरम्भ।” सुसमाचार  शब्द का यह उपयोग उन सब बातों के लिए है जिन्हें मरकुस हमें यीशु के शिक्षा और कार्य के विषय में बताता है। हम एक और विस्तारपूर्ण उपयोग प्रकाशितवाक्य 14:6-7 में देखते हैं: 

फिर मैंने एक और स्वर्गदूत को मध्य आकाश में उड़ते देखा। और उसके पास पृथ्वी पर रहने वाली हर जाति, कुल, भाषा और लोगों को सुनने के लिए अनन्त  सुसमाचार था। उसने ऊँची आवाज़ से कहा, “परमेश्वर से डरो और उसकी महिमा करो; क्योंकि उसके न्याय का समय आ पहुंचा है। उसी की उपासना करो जिसने स्वर्ग, पृथ्वी, समुद्र और जल के सोते बनाए।”  

यहां सुसमाचार पश्चात्ताप और परमेश्वर की आराधना करने का आह्वान करता है।

अधिकतर, सुसमाचार शब्द का उपयोग सूक्ष्म रूप से किया जाता है, और इसकी विषयवस्तु विस्तृत है। इसे हम 1 कुरिन्थियों 15:1-4 में देख सकते हैं:

हे भाइयों, अब मैं तुम्हें वही सुसमाचार सुनाता हूं जिसका मैंने तुम्हारे मध्य प्रचार किया, जिसे तुमने ग्रहण भी किया और जिसमें तुम स्थिर हो। जिसके द्वारा तुम उद्धार भी पाते हो, इस शर्त पर कि तुम उस वचन को जिसका मैंने तुम्हारे मध्य प्रचार किया दृढ़ता से थामे रहो—अन्यथा तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ हुआ। मैंने यह बात जो मुझ तक पहुंची थी उसे सबसे मुख्य जानकर तुम तक भी पहुंचा दी, कि पवित्रशास्त्र के अनुसार मसीह हमारे पापों के लिए मरा, और गाड़ा गया, तथा पवित्रशास्त्र के अनुसार तीसरे दिन जी भी उठा।

यहां, सुसमाचार यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा बचाए जाने का सन्देश है।

दूसरे स्थान पर पौलुस लिखता है, “परमधन्य परमेश्वर का महिमामय सुसमाचार जिसे मुझे सौंपा गया है,” और वह स्पष्ट करता है कि सुसमाचार क्या है:

यह एक विश्वसनीय और हर प्रकार से ग्रहणयोग्य बात है कि मसीह यीशु संसार में पापियों का उद्धार करने आया—जिनमें सब से बड़ा मैं हूं। फिर भी मुझ पर इस कारण दया हुई कि मसीह यीशु मुझ सब से बड़े पापी में अपनी पूर्ण सहनशीलता प्रदर्शित करे कि मैं उनके लिए जो उस पर अनन्त जीवन के निमित्त विश्वास करेंगे, आदर्श बनूं (1तीमुथियुस 1:11, 15-16)

यहां, सुसमाचार पापियों को बचाने के लिए मसीह के कार्य को बता रहा है।

इसी तरह से पौलुस 2 तीमुथियुस में लिखाता है: 

अतः तू न हमारे प्रभु की साक्षी देने से, न मुझ से, जो उसका बंदी हूं, लज्जित हो; परन्तु परमेश्वर के सामर्थ्य के अनुसार सुसमाचार के लिए मेरे साथ दुख उठा। जिसने हमारा उद्धार किया, और पवित्र बुलाहट से बुलाया, हमारे कामों के अनुसार नहीं, परन्तु अपने ही उद्देश्य और अनुग्रह के अनुसार जो मसीह यीशु में अनन्तकाल से हम पर हुआ, परन्तु अब हमारे उद्धारकर्ता मसीह यीशु के प्रकट होने के द्वारा प्रकाशित हुआ है। जिसने मृत्यु का नाश किया और सुसमाचार के द्वारा जीवन और अमरता पर प्रकाश डाला।… मेरे सुसमाचार के अनुसार दाऊद के वंशज मृतकों में से जी उठे यीशु मसीह को स्मरण रख। (2 तीमुथियुस 1:8-10, 2:8)

सोलहवीं शताब्दी के धर्मसुधारकों के लेखन में सुसमाचार शब्द का यह सकरा उपयोग बहुत सामान्य था। इसे हम जॉन कैल्विन के विचारों में देख सकते हैं:

विश्वास शब्द को उपलक्षण के रूप में उपयोग किया गया है (जिसमें एक विचार के नाम का उपयोग दूसरे विचार के लिए किया जाता है) प्रतिज्ञा शब्द के लिए  प्रयोग किया जाता है, अर्थात् ,स्वयं सुसमाचार के लिए, क्योंकि यह विश्वास से सम्बन्धित है। व्यवस्था और सुसमाचार के बीच में अन्तर को समझा जाना चाहिए, और इस अन्तर से हम निष्कर्ष निकालते हैं कि, जिस प्रकार व्यवस्था कार्य की मांग करता है, सुसमाचार केवल यह मांग करता है कि मनुष्य केवल विश्वास लाएं ताकि वह परमेश्वर के अनुग्रह को प्राप्त कर सकें।

यह जै़करायस उर्सिनस (Zacharias Ursinus) में भी स्पष्ट है। हाइडलबर्ग धर्मप्रश्नोत्तरी के अपनी टीका के आरम्भ में ही उर्सिनस सभी सिद्धान्तों को व्यवस्था और सुसमाचार में विभाजित करता है:

कलीसिया के सिद्धान्त में दो भाग हैं: व्यवस्था और सुसमाचार; जिसमें हमने पवित्रशास्त्र के सार और तत्व को समझ लिया  है। व्यवस्था दस आज्ञाएं कहलाती  है, और सुसमाचार मसीह की  मध्यस्थता के विषय में सिद्धान्त है, और विश्वास के द्वारा मुफ्त में पापों की क्षमा मिलती है। 

पवित्रशास्त्र में सुसमाचार पर इस प्रकार के विचार धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञान में सामान्य  हैं, जैसा कि इसको हम एक महान डच ईश्वरविज्ञानी हरमन बाविंक (Herman Bavinck) के लम्बे, आकर्षक उद्धरण से देखते हैं:

परन्तु परमेश्वर का वचन, व्यवस्था और सुसमाचार दोनों के ही रूप में, परमेश्वर की इच्छा का प्रकाशन है, अर्थात् कार्यों की वाचा और अनुग्रह की वाचा की उद्घोषणा। यद्यपि एक बड़े अर्थ में “व्यवस्था और सुसमाचार” शब्द का उपयोग वास्तव में अनुग्रह की वाचा के पुराने और नए व्यवस्था के लिए किया जा सकता है।,उनके वास्तविक अर्थ में वे निश्चित रीति से परमेश्वरीय इच्छा के दो अलग-अलग प्रकाशन का वर्णन करते हैं [यहाँ बाविंक प्रमाण के लिए नए नियम के कई खण्डों का उद्धरण करता है] . . . । इन खण्डों में व्यवस्था और सुसमाचार को मांग एवं उपकार, पाप एवं अनुग्रह, बीमारी एवं चंगाई, मृत्यु एवं जीवन के रूप में भिन्न दिखाया गया है . . . । व्यवस्था परमेश्वर की पवित्रता से आती है, सुसमाचार परमेश्वर के अनुग्रह से आता है, व्यवस्था को प्रकृति के द्वारा जो जाना जाता है, सुसमाचार केवल विशेष प्रकाशन से; व्यवस्था सिद्ध धार्मिकता की मांग करती है, परन्तु सुसमाचार इसे प्रदान करता है; व्यवस्था लोगों को कार्यों के द्वारा अनन्त जीवन की ओर ले जाती है, और सुसमाचार विश्वास में दिए गए अनन्त जीवन के धन से अच्छे कार्यों को उत्पन्न करता है; व्यवस्था वर्तमान में लोगों को अपराधी ठहराता है, और सुसमाचार लोगों को निर्दोष ठहराता है; व्यवस्था सभी लोगों को सम्बोधित करती है ,और सुसमाचार केवल उन लोगों को सम्बोधित करता है जो उसे सुनते हैं।

सुसमाचार की यह प्रस्तुति कितनी स्पष्ट, विशिष्ट, बाइबलीय और अनमोल है।

कलीसिया को छोटे और बड़े दोनों अर्थों में सुसमाचार प्रचार करने की आवश्यकता है। सुसमाचार के लिए यूनानी शब्द ने अंग्रेजी बोलने वाले लोगों को इवैन्जलिज़म (सुसमाचार प्रचार) शब्द दिया है। सच्चा सुसमाचार प्रचार, मत्ती 28:18-20 में यीशु के द्वारा दिए गए महान आदेश के अनुसार, शिष्य बनाने की बात है: पहले, सूक्ष्म अर्थ में, लोगों को यीशु पर विश्वास करने के लिए बुलाते हुए, और दूसरा, बड़े अर्थ में उनको वे सारी बातें सिखाते हुए जो यीशु ने अपने लोगों को सिखाया था। सुसमाचार के लिए, आइए हम सब सच्चे सुसमाचार प्रचार को बढ़ावा दें।

यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

डब्ल्यू. रॉबर्ट गॉडफ्रे
डब्ल्यू. रॉबर्ट गॉडफ्रे
डॉ. डब्ल्यू. रॉबर्ट गॉडफ्रे लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ के एक सह शिक्षक हैं और कैलिफ़ोर्निया के वेस्टमिन्सटर सेमिनरी में ससम्मान सेवामुक्त अध्यक्ष और प्रोफेसर हैं। वह कलीसिया के इतिहास के सर्वेक्षण के छह-भाग लिग्निएर शिक्षण श्रृंखला के लिए विशेष रूप से शिक्षक हैं और कई पुस्तकों के लेखक, जिसमें सेविंग रिफॉर्मेशन भी सम्मिलित है।