चिन्ता के प्रभाव - लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
चिन्ता का स्रोत
11 जनवरी 2022

चिन्ता के प्रभाव

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का चौथा अध्याय है: चिन्ता

कभी-कभी, भले ही हम जानते हैं कि कुछ गड़बड़ है, तब भी इसका कुरूप पहलू देखने में थोड़ा समय लग सकता है। तीव्र आँधी के समय में जेनरेटर को द्वार के ठीक बाहर बरामदे में चलाना एक अच्छा विचार लग सकता है, परन्तु कार्बन मोनोऑक्साइड विषाक्तन से होने वाला सिरदर्द शीघ्र ही पर्याप्त होगा हमें कुछ और बताने के लिए। किसी भी अन्य बात के समान जिसके विषय में पवित्रशास्त्र हमें चेतावनी देता है, चिन्ता के भी कुछ क्षतिपूर्ण प्रभाव होते हैं। नए नियम का चिन्ता के लिए शब्द, मेरिम्ना, को “चिन्ता करना” भी अनुवाद किया गया है। क्योंकि चिन्ता हमारे संसार में वास्तविक और प्रचलित है, इसलिए इसका प्रभाव भी। और जब कि चिन्ता काल्पनिक परिदृश्यों, वास्तविक और वर्तमान के विषयों, या आने वाले विनाश की भावना से आ सकती है, एक निरन्तर चिन्ता का जीवन इसे परमेश्वर और पड़ोसी से प्रेम करना असम्भव बना देता है जैसा कि हमें करना चाहिए। कारण और स्रोत पर ध्यान दिए बिना, चिन्ता जीवन को विविध स्तरों पर बाधित करती है।

शारीरिक प्रभाव

इसका एक कारण है कि यीशु ने पूछा, “तुम में से कौन है जो चिन्ता करके अपनी आयु एक घड़ी भी बढ़ा सकता है?” (मत्ती 6:27)। हम सभी जानते हैं कि चिन्ता एक स्वस्थ दीर्घायु की कुंजी नहीं है। डर लगना, दुख का आभास होना और नींद में कमी मात्र आरम्भ है। जबकि पुराना दर्द, विकलांगता, या लम्बी अवधि की बिमारी जैसी परिस्थियाँ चिन्ता को उत्पन्न कर सकती हैं, स्थिति दूसरी ओर भी जा सकती हैं। पुरानी चिन्ता असामान्य शारीरिक स्थिति के कारण पीड़ा, अस्वस्थता, और अन्य शारीरिक समस्याएँ उत्पन्न कर सकती है। अधिवृक्क रस (adrenaline) और कोर्टिसॉल (cortisol) हमारे शरीर में कई महत्वपूर्ण कार्यों को निभाते हैं—परमेश्वर ने उन्हें हमें भले कारण के लिए दिया है। इन हार्मोनों में वृद्धि परिवर्तित शरीरवृत्ति के माध्यम से हमें तनावपूर्ण परिस्थितियों का सामना करने के योग्य बनाते हैं: हमारी नाड़ी का तीव्र हो जाना, हमारी सांसों का बढ़ जाना, और रक्त वाहिकाओं का विस्तार हो जाना, हमारे मस्तिष्कों और मांसपेशियों को अधिक ऑक्सीजन देने लगना, हमारी एकाग्रता पर ध्यान केन्द्रित करना। परन्तु जब ये हार्मोन हमारे शरीर प्रणाली के माध्यम से बहुत बार या बहुत लम्बी अवधि के लिए प्रवाहित होते हैं, तो इसका परिणाम अनेक अस्वस्थताएँ हो सकती हैं।

बढ़ता हुई मात्रा में, वैज्ञानिक चिन्ता और नकारात्मक शारीरिक प्रभावों के मध्य कड़ी ढूंढ रहे हैं। अध्ययनों से पता चला है कि चिन्ता स्वस्थ व्यस्कों में हृदय रोग का कारण बन सकती है और वह पुराना भावनात्मक तनाव और चिन्ता पाचन तंत्र की बहुत समस्याओं के की प्रवृत्ति से जुड़ा हुआ है, अम्लीय भाटा (acid reflux) से उद्दीप्य आंत्र सहलक्षण (irritable bowel syndrome) से कैंसर। और परिस्थिति उम्र के साथ अधिक चिन्ताजनक है, क्योंकि वृद्ध व्यस्कों को सम्भवतः अन्य गम्भीर बिमारियाँ हो सकती हैं जो कि चिन्ता से जुड़ी शारीरिक स्थितियों और ह्रासों को तीव्रता से बढ़ाती हैं। अनुसंधान की मात्रा बढ़ रही है। अपनी मृत्यु के लिए चिन्ता करना हमारे सोचने से अधिक संकट का कारण हो सकता है।

सम्बन्धनात्मक प्रभाव

चिन्ता के हमारे शरीरों पर प्रदर्शनीय, मापने योग्य प्रभाव होते हैं। परन्तु जड़ प्राय: हमारे मानसिक और आत्मिक जीवनों में होती है। इस कारण से, हम अपने सम्बन्धों के अप्रभावित होने की अपेक्षा नहीं कर सकते। चिन्ता के सम्बन्धनात्मक प्रभाव भी हानिकारक रूप से शक्तिशाली होते हैं। चिकित्सकीय रूप से, चिन्ता अल्प-कालिक स्मरणशक्ति, एकाग्रता, मौखिक और स्थानिक प्रदर्शन, पठन अवधान विस्तृति (reading attention span) एवं  कई अधिक की कठिनाइयों से सम्बंधित होती है। कोई आश्चर्य नहीं है कि यह समाजीकरण को कठिन बनाती है।

परन्तु कठिनाइयाँ कार्यात्मक पहलुओं से परे हैं। हम उपाख्यानात्मक रूप से जानते हैं कि वास्तव में चिन्तित व्यक्ति से मिलना कठिन है। यदि वार्तालाप चलती रहती है, तो वह या तो सतही पर ध्यान केन्द्रित करने की ओर होगी या हमें अन्धकारमय चिन्ताओं के संसार की ओर खींचेंगी जिसमें यह दूसरा व्यक्ति रहता है। एक वृद्ध महिला को मैं जानती हूँ जो किसी से मिलते समय न केवल भयावह दुर्घटनाओं की सूची का व्याख्यान और निरुपण करती रहती परन्तु भविष्य के भय को विस्तारपूर्वक बताने वाली सम्भावित कठिन प्रबन्धों को भी सूचीबद्ध करती है। ऐसा प्रतीत होता था जैसे कि प्रभावों से अनजान, उसने अन्धकारमय विचारों के लिए पूरा द्वार खोल रखा था। उसने अपने जीवन में वास्तविक शोक का अनुभव किया था, परन्तु यह उसकी भविष्य के विषय में चिन्ता थी जो अन्य लोगों के साथ वास्तविक सम्बन्धनात्मक घनिष्ठता को रोकती थी।

चिन्ता हमें अपने आप में और हमारी समस्याओं में ध्यान केन्द्रित कराती है। हम अपने में संकुचित हो जाते हैं, उन बोझों के नीचे दब जाते हैं जो हमारे ढोने के लिए नहीं थे, जब हम जाते हैं उन्हें खींचते हुए और औरों पर टकराते हुए जाते हैं। जीनी मरी गुयोन (Jeannie Marie Guyon) ने एक मित्र को बताया, “उदासीनता हृदय को संकुचित कर देती और मुर्झा देती है. . . . यह वस्तुओं को और बड़ा बनाती और उन्हें झूठे रंग देती है, और इस प्रकार आपके बोझ सहन करने के लिए अत्यन्त भारी हो जाते हैं।” चिन्ता संसार के हमारे दृष्टिकोण को पापमय नकारात्मक लेंस से रंगीन कर देता है। स्पष्ट रूप से, इस प्रकार के प्रभाव अन्य लोगों के साथ सामाजीकरण और स्वस्थ्य सम्बन्धों में रुकावट उत्पन्न करेंगे।

परन्तु प्रभाव सामाजीकरण से परे है। अपने प्रार्थना के भजन, “पिता, मैं जानता हूँ कि मेरा सारा जीवन” (Father, I Know That All My Life) में ऐना वॉरिंग माँगती है कि उसे एक “स्वयं से अवकाश पाए हृदय प्राप्त हो, जो शान्ति दे सके और सहानुभूति जता सके।” चिन्ता हमसे यह छीन लेती है। स्वयं पर ध्यान केन्द्रित करते हुए, हम स्वयं से अवकाश पाए हुए नहीं हैं। इसके स्थान पर, हम अपने स्वयं के विचारों और पूर्वव्यस्तता में लिप्त हो जाते हैं और इसलिए अपने आस पास के वास्तविक अवसरों से कट जाते हैं। चिन्ता हमें सामाजिक सम्बन्धों से छीन लेती है, हाँ, पर साथ में सेवा की योग्यता और अवसर को भी। यह हमें आत्मिक सम्बन्धों से छीन लेती है जो संगति और उपयोगिता से प्रवाहित होती है। सम्बन्धनात्मक अलगाव जो चिन्ता से आता है वह अकस्मात नहीं है। यह शैतान की एक चाल है। जिस विश्वासी के पास घनिष्ठ सम्बन्ध और सामुदायिक अनुबन्ध नहीं हैं, वह सन्देह और निराशा के लिए एक सरल लक्ष्य है। चिन्ता के सम्बन्धनात्मक और आत्मिक प्रभाव निकटता से जुड़े हुए हैं।

आत्मिक प्रभाव

चिन्ता का प्रभाव वास्तव में प्राण में प्रारम्भ और समाप्त होता है। यदि चिन्ता हमारे मानवीय सम्बन्धों पर प्रभाव डालती है, तो कैसे यह परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध को प्रभावित नहीं करेगी? चिन्ता प्रायः तब होती है जब हम परमेश्वर के ज्ञान और भलाई पर सन्देह करते हैं या उससे दृष्टि हटा लेते हैं। अपनी माँ के दूध छुड़ाए बच्चे समान होने के स्थान पर हमारे प्राण व्यथित और लोभी, ऐसी वस्तुओं के लिए चिन्ताशील हैं जो हमारे परे हैं (भजन 131:2)। हम प्रबन्धों में विश्राम नहीं पा सकते हैं। यह विशेष रूप से तब सत्य है जब हम उन बातों के विषय में चिन्तित होते हैं जो हुयी तक नहीं हैं। एलिसाबेथ एलियट हमें स्मरण कराती हैं कि परमेश्वर अनुग्रह की प्रतिज्ञा हमारी कल्पना के लिए नहीं परन्तु केवल वास्तविकता के लिए करता है। वह हर प्रातः के लिए नयी दया की प्रतिज्ञा करता है, हर चिन्ता के लिए नहीं। फिर से, वॉरिंग कहती हैं, “हर पथ को कँटीली झाड़ियों ने घेरा हुआ हैं जो धैर्यवान देखभाल की माँग करतीं हैं; हर भाग में एक क्रूस, और प्रार्थना की एक तत्पर आवश्यकता; परन्तु एक दीन हृदय जो तुझ पर निर्भर है कहीं पर भी आनन्दित है।” चिन्ता के आत्मिक संकटों को पहचानना इसको नकारना नहीं है कि इस संसार में कठिन और भयावह बातें हैं। परन्तु, गुयोन हमें सचेत करती हैं, “एक उदास बाह्य स्वरूप निश्चय ही भक्ति के प्रति आकर्षित करने के स्थान पर प्रतिरोध लाएगा। परमेश्वर की सेवा करना आवश्यक है, आत्मा के एक निश्चित आनन्द के साथ, स्वतन्त्रता और खुलेपन के साथ, जो यह प्रकट करता है कि उसका जुआ आसान है।”

यह ही इस बात का हृदय है, है न? हम अधिकाशतः चिन्तित रहते हैं क्योंकि या तो विश्वास नहीं करते या यह आभास नहीं कर पाते कि मानो हमारा चरवाहा भला है। कभी-कभी अन्धकार दबाव डालता है, और यह विश्वास करना कि परमेश्वर हर समय भला है एक आत्मिक युद्ध है। कभी-कभी उस सत्य का अनुभव करना दूर की आशा है। इसलिए चिन्ता का हमारे प्राणों पर हानिकारक प्रभाव होता है। यह हमें पिता पर सन्देह करवाता है, यहाँ तक कि उस पर जिसने अपने एकलौते पुत्र को न रख छोड़ा। चिन्ता झूठ को सुनती है—झूठ जो कि ऊँचे और हस्तक्षेप करने वाले हो सकते हैं, परन्तु फिर भी झूठ हैं। परन्तु चिन्तित होना उन झूठों को बढ़ाता है, जैसे कि हम कलीसिया और संसार में ख्रीष्ट का नाम लेकर आचरण करते हैं जबकि व्यवहार ऐसे करते हैं मानो कि वह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञानी, सर्वउपस्थित, और भला नही है। चिन्ता सच्चाई को निकाल देने का प्रयास करती है— और जहाँ ऐसा होता है झूठ अन्दर आने की व्यवस्था कर लेता है। परमेश्वर के चरित्र और प्रतिज्ञाओं के विषय में झूठ सबसे अधिक विनाशकारी होते हैं, क्योंकि वे हमारे एकमात्र सहायक के प्रति सन्देह उत्पन्न करने की खोज में रहते हैं। चिन्ता और इसके साथ आने वाला झूठ हमें परमेश्वर से अलग कर देते हैं। सम्भवतः इसीलिए ऐलेन टाउनसेंड ने लिखा है, :”प्रभु, मुझे चिन्ता न करना सिखाएँ, परन्तु आपके साथ अपना हृदय साझा करना सिखाएँ; और धन्यवाद आपकी शान्ति के लिए जो कि मैं आपके साथ साझा करती हूँ”।

निष्कर्ष

एक साथ में, ये सभी प्रभाव गम्भीर हैं। पर इन्हें आपको चिन्ता न देने दें। वे स्पष्ट रूप से हमारी चिन्ता को सही ठहराने की मूर्खता दिखाते हैं। हम सभी ऐसा करते हैं, है न? कभी-कभी हम झल्लाहट के लिए कुछ महत्वपूर्ण और मूल्यवान चुन कर ऐसा करते हैं। हम अपने मनों में, हमारे बच्चों के प्रति हमारी चिन्ता उनके लिए हमारे प्रेम द्वारा सही ठहरती है। हम समाज के प्रति अपनी चिन्ता को सुरक्षा और नैतिकता के लिए अपनी चिन्ता द्वारा सही ठहराते हैं। हम स्वास्थ्य के प्रति झल्लाहट को भण्डारीपन के दावे के साथ सही ठहराते हैं। अन्य समयों में, हम अपनी चिन्ता को सही ठहराने का प्रयास संकट का चुनाव करके इसे पोषित करने के लिए, गाडि‌यों की दुर्घटनाएँ या अन्त्य रोग के क्या प्रभाव होंगे पर विचार करके करते हैं। हम अपनी चिन्ता को अपने मनों में और सम्भवतः अपने मित्रों के सामने सही ठहराते हैं।

परन्तु ऐसी बात जो हमारे शरीरों, मनों, और प्राणों के लिए अत्यन्त विनाशकारी है, उससे लड़ा जाना चाहिए। ऐसी बात जिसमें हमें परमेश्वर से, हमारे समुदायों से, और अच्छे स्वास्थ्य से दूर रखने की क्षमता हो, उसको वास्तव में सही नही ठहराया जा सकता, है न? हमारे पास युद्ध में समपर्ण कर देने के लिए, युद्ध विराम की पुकार का, या समझौता कर लेने का कोई कारण नहीं है। कोई तर्काधार पर्याप्त नहीं है। हम कभी-कभी चिन्ता को परख, सही चिन्ता, या यहाँ तक कि प्रेम और प्रार्थनापूर्णता से भी जोड़ देते हैं। परन्तु उन बातों का फल ईश्वरीय कार्य और भरोसा है। वे जीवन देते हैं। चिन्ता का फल विविध स्तरों पर घात करता है। आइए उसे सही न ठहराएँ। दाँव बहुत ऊँचे हैं। आइए इससे लड़ें। लड़ाई हो सकता है संक्षिप्त या सुस्पष्ट न हो,और इसमें हो सकता है चिकित्सकों, पास्टरों और अन्य लोगों की सहायता सम्मिलित हो, परन्तु इस अच्छी लड़ाई से हार मान जाना परमेश्वर की सन्तानों के लिए विकल्प नहीं हो सकता है।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
रेबेका वैनडूडेवार्ड
रेबेका वैनडूडेवार्ड
रेबेका वैनडूडेवार्ड लेखक हैं रेफॉर्मेशन विमेन: सिक्सटीन्त सेन्चुरी फिगर्स हू शेप्ड क्रिस्टियैनिटीज़ रीबर्त और बच्चों के लिए बैनर बोर्ड पुस्तक श्रृंखला की लेखिका हैं। वे ग्रान्ड रैपिड्स, मिशिगन में रहती हैं।