बिना सर्वनियन्त्रक बने घर को संचालित करना- लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
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बिना सर्वनियन्त्रक बने घर को संचालित करना

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का पांचवा अध्याय है: सिद्धतावाद एवं नियंत्रण

मैं अधिकाई से इस बात पर विश्वास करने लगा हूँ कि जीने के केवल दो ही मार्ग हैं: (1) परमेश्वर पर भरोसा रखना और उसकी इच्छा तथा उसके अधिकार के अधीन रहना, या (2) परमेश्वर बनने का प्रयास करना। इन दोनों के अतिरिक्त कुछ और नहीं है। पापी होने के रूप में, हम पूर्व की तुलना में बाद के विकल्प में आगे प्रतीत होते हैं। यह आत्मिक सम्बन्ध बच्चों की परवरिश तथा विवाह के केन्द्र पर कार्य करता है।

परवरिश
सफल परवरिश, परमेश्वर द्वारा ठहराए गए उचित नियंत्रण को खोना है। परवरिश का लक्ष्य उन बच्चों को बढ़ाना है जो एक समय हम पर पूरी रीति से निर्भर थे कि वे स्वतंत्र, परिपक्व लोग बनें, जो परमेश्वर पर निर्भर होते हुए तथा ख्रीष्टिय समुदाय से उचित रीति से सम्बन्ध रखते हुए, अपने दोनों पैरों पर खड़े होने में सक्षम हैं।

परवरिश के आरम्भिक वर्षों में, सब कुछ हमारे नियंत्रण में है, और यद्यपि हम इस सब के तनाव के विषय में कुड़कुड़ाते हैं, हमें वह अधिकार रखना पसन्द है। शिशु और युवा बच्चे बहुत कम बातों को स्वयं करने का चुनाव करते हैं। हम उनका भोजन, आराम करने के समय, शारीरिक व्यायाम के शैली, वे क्या देखते और सुनते हैं, कहाँ जाते हैं, उनके मित्र कौन हैं—और यह सूची बढ़ती चली जाती है—का चुनाव करते हैं।

परन्तु, वास्तविकता यह, है कि पहले दिन से ही हमारे बच्चे स्वतंत्र हो रहे हैं। वह बच्चा जो एक समय सहायता के बिना लुढ़कने में असमर्थ था, अब हमारी सहायता के बिना स्नानघर में घुटनों के बल पर चला जाता है, और वहाँ पर रखी वस्तुओं से खेलता है। यही बच्चा शीघ्र ही घर तथा अपने माता-पिता की पहुँच से दूर गाड़ी चलाते हुए जा रहा होगा।

कितने माता-पिता ने अपने बच्चों द्वारा चुने गए मित्रों के साथ संघर्ष किया है? हाँ, मित्रों का चुनाव बहुत ही गम्भीर विषय है, परन्तु यह एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर हम एक परिपक्व होते हुए बच्चे को नियंत्रण दे देते हैं। परवरिश करने का लक्ष्य अपने बच्चों पर उनकी सुरक्षा और अपने मानसिक संतुलन को बनाए रखने के प्रयास में कठोर नियंत्रण बनाए रखना नहीं है। केवल परमेश्वर ही उस प्रकार के नियंत्रण का प्रयोग करने में सक्षम है। इसके विपरीत, लक्ष्य है उसके द्वारा उपयोग किए जाना ताकि हम अपने बच्चों में वचन के सिद्धान्तों के द्वारा परिपक्व आत्म नियंत्रण की शिक्षा दें और उन्हें सदैव-विस्तृत होने वाले क्षेत्रों के चुनाव, नियंत्रण, तथा स्वतंत्रता का अभ्यास करने की अनुमति दें।

एक परामर्शकर्ता और पास्टर के रूप में, मैं नियमित रीति से ऐसे माता-पिता के साथ कार्य करता था जो समय में पीछे जाना चाहते थे। उन्होंन सोचा कि सम्पूर्ण नियंत्रण के पुराने दिनों में पुनः जाना ही उनकी एकमात्र आशा है। उन्होंने अपने जवान बच्चों के साथ एक छोटे बच्चे के जैसे व्यवहार करने का प्रयास किया। वे माता-पिता से अधिक जेलर के समान बन गए, और वे सुसमाचार को देना भूल गए जो संघर्ष के उन महत्वपूर्ण क्षणों में एकमात्र आशा था।

यह महत्वपूर्ण है कि हम सुसमाचार के तीन सत्यों को स्मरण रखें क्योंकि यह इन परवरिश सम्बन्धी संघर्षों से जुड़े हैं:

  1. ऐसी कोई भी स्थिति नहीं है जो नियंत्रण में न हो, क्योंकि कलीसिया के लिए ख्रीष्ट सब बातों पर शासन करता है (इफिसियों 1:22)।
  2. न केवल स्थिति नियंत्रण में है, पर परमेश्वर उस भलाई को करने में कार्य रहा है जिसे करने के लिए उसने प्रतिज्ञा की है (रोमियों 8:28)। इसलिए मुझे अपने परिपक्व हो रहे बच्चे की प्रत्येक इच्छा, विचार और कार्य को नियंत्रित करने की आवश्यकता नहीं है। प्रत्येक स्थिति में, वह उस ख्रीष्ट के सम्प्रभुता पूर्ण नियंत्रण में है, जो वह कर रहा है जिसे मैं नहीं कर सकता।
  3. मेरे परवरिश करने का लक्ष्य मेरे बच्चों को अपने स्वरूप के अनुरूप बनाना नहीं है, परन्तु इस रीति से कार्य करना है कि वे ख्रीष्ट के स्वरूप के अनुरूप हों। मेरा लक्ष्य अपने बच्चों के भीतर अपने जैसे रुचि, विचार, और अपने स्वभाव को बनाना नहीं है। मैं उनमें अपने स्वरूप को नहीं ढूंढ रहा हूँ परन्तु मैं ख्रीष्ट के स्वरूप को देखने की लालसा करता हूँ।

हम परवरिश के विषय में नहीं सोच सकते हैं, बिना सच्चाई से उसे देखे, जिसे हम, माता-पिता के रूप में, संघर्ष में लाते हैं। यदि हमारे हृदय सफलता, प्रशंसा और नियंत्रण द्वारा चलाए चलते हैं, तो हम अनजाने में अपने बच्चों की आत्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने के स्थान पर अपनी अपेक्षाओं को पूरा करने की लालसा करेंगे। संघर्ष के समयों को परमेश्वर प्रदत्त अवसर के द्वार के रूप में देखने के स्थान पर, हम उन्हें परेशान करने वाले, निराशाजनक क्रोध उत्पन्न करने वाले घटनाओं के रूप में देखेंगे, और हम उन्हीं बच्चों के प्रति बढ़ते क्रोध का अनुभव करेंगे जिनकी सेवा करने के लिए हमें बुलाया गया है।

विवाह
यह विवाह के साथ भी सत्य है। हमारे विवाह एक ऐसे संसार के मध्य रहते हैं जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य नहीं करता है। किसी न किसी प्रकार से, हमारे विवाह प्रति दिन संसार के टूटेपन से प्रभावित होते हैं। सम्भवतः यह केवल एक पतित संसार का निम्न-श्रेणी की समस्याओं के साथ जीने की आवश्यकता से है या सम्भवतः हम ऐसे बड़े समस्याओं का सामना कर रहे हैं जिन्होंने हमारे जीवन और विवाह को परिवर्तित कर दिया है। परन्तु एक बात निश्चित है: हम उस वातावरण से नहीं बचेंगे जिसे परमेश्वर ने हमारे रहने के लिए चुना है।

यह कोई दुर्घटना नहीं है कि हम इस पतित संसार में अपने विवाह का संचालन कर रहे हैं। यह कोई दुर्घटना नहीं है कि हमें उन बातों का सामना करना पड़ता है जिन्हें हम करते हैं। यह कोई नियति, संयोग, या भाग्य की बात नहीं है। यह सब परमेश्वर की छुटकारे की योजना का एक भाग है। प्रेरितों के काम 17 कहता है कि वह हमारे विशेष निवास स्थान और हमारे जीवन की निश्चित सीमा को निर्धारित करता है।

परमेश्वर जानता है कि हम कहाँ रहते हैं, और वह उन बातों से आश्चर्यचकित नहीं होता है जिनका हम सामना कर रहे हैं। भले ही हम उन बातों का सामना करते हैं जिन्हें हम नहीं समझ सकते हैं, परन्तु हमारे सामने आने वाली प्रत्येक बातों के पीछे अर्थ और उद्देश्य होता है। मैं मानता हूँ कि एकता, समझ, और प्रेम के विवाह का निर्माण करने के लिए हमारे पतित संसार को और इसमें हमें रखने के लिए परमेश्वर के उद्देश्य को समझना आधारभूत है।

आप देखिए, हम में से अधिकांश लोगों के मन में व्यक्तिगत प्रसन्नता का आदर्श है। अब, प्रसन्न रहने की इच्छा त्रुटिपूर्वक नहीं है, और वैवाहिक खुशी की ओर कार्य करना त्रुटिपूर्वक नहीं है। परमेश्वर ने हमें आनन्द लेने की क्षमता दी है और उसने आनन्द लेने के हमारे चारों ओर अद्भुत वस्तुएं प्रदान की हैं। समस्या यह नहीं है कि यह एक त्रुटिपूर्वक लक्ष्य है, परन्तु यह कि यह एक बहुत ही छोटा लक्ष्य है। परमेश्वर कुछ गहन, आवश्यक और अनन्त बात पर कार्य कर रहा है। 

परमेश्वर के पास व्यक्तिगत पवित्रता का आदर्श है। इस भाषा से पीछे मत हट जाइए। इन शब्दों का अर्थ है परमेश्वर हमें परिवर्तित करने के लिए हमारी दैनिक परिस्थितियों के माध्यम से कार्य कर रहा है। अपने प्रेम में, वह जानता है कि हम सब वह नहीं हैं जो हमें होने के लिए बनाया गया था। यद्यपि यह स्वीकार करना कठिन हो सकता है, हमारे भीतर अभी भी पाप है, और वह पाप बाधा डालता है उस के लिए जो हमें होना चाहिए और जिसे के लिए हम निर्मित किए गए हैं (और, वैसे, वह पाप एकता, समझ, और प्रेम के विवाह के लिए सबसे बड़ी बाधा है)।

परमेश्वर यहाँ और अभी की कठिनाई का उपयोग हमें परिवर्तित करने के लिए, अर्थात, हमें हम ही से छुड़ाने के लिए। और क्योंकि वह हमसे प्रेम करता है, वह जानते हुए उस छुटकारा और परिवर्तन की प्रकिया में एक और कदम पूरा करने के लिए पल भर के सुख में बाधा डालेगा या समझौता करेगा, जिसके लिए वह अटल रीति से समर्पित है।

जब हम परमेश्वर के आदर्श को स्वीकार करना आरम्भ करते हैं, तब जीवन अधिक समझ में आता है—जिन बातों का हम सामना करते हैं वे तर्कहीन संकट नहीं परन्तु परिवर्तित करने वाले उपकरण हैं। और हमारे लिए और हमारे विवाहों के लिए आशा है, क्योंकि परमेश्वर हमारे समस्याओं के मध्य में है, और वह उनका उपयोग हमें उस रूप में ढालने के लिए कर रहा है जिसमें उसने हमें होने के लिए बनाया है। जब वह यह करता है, हम न केवल जीवन के प्रति अच्छी रीति से प्रतिक्रिया देते हैं, परन्तु हम साथ रहने के लिए अच्छे लोग बन जाते हैं, जिसका परिणाम स्वस्थ्य विवाहों में होता है।

इसलिए, किसी न किसी प्रकार, यह पतित संसार और इसमें जो कुछ भी है हमारे द्वारों में प्रवेश करेगा, परन्तु हमें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर हमारे साथ है, और वह कार्य कर रहा है ताकि इन जटिल बातों का परिणाम हमारे भीतर और हमारे द्वारा भली बातों में हो।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
पॉल डेविड ट्रिप
पॉल डेविड ट्रिप
डॉ पॉल डेविड ट्रिप (@Paul Tripp) एक पास्टर, वक्ता, और कई पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें आपने क्या सोचा था? (What Did You Expect?) और नई सुबह की करुणा (New Morning Mercies) सम्मिलित हैं। वे पॉल ट्रिप सेवकाई (Paul Tripp Ministries) के संस्थापक और अध्यक्ष हैं।