दुख उठाना और परमेश्वर की महिमा - लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
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दुख उठाना और परमेश्वर की महिमा

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का दूसरा अध्याय है: ख्रीष्ट के साथ मिलन

मैं एक बार एक महिला से मिलने गया जो गर्भाशय के कैंसर से मर रही थी। वह अत्यन्त ही व्यथित थी, परन्तु केवल अपनी शारीरिक रोग के कारण नहीं। उसने मुझे बताया कि जब वह युवती थी तब उसने एक गर्भपात किया था, और वह इस बात से दृढ़ निश्चित थी कि उसका रोग उसी बात का प्रत्यक्ष परिणाम है। संक्षेप में, उसका मानना था कि कैंसर उसपर परमेश्वर का न्याय था।

मृत्यु के अन्तिम पड़ाव पर खड़े किसी व्यक्ति द्वारा ऐसे पीड़ादायी प्रश्न का सामान्य पास्तरीय प्रत्युत्तर यही कहना है कि कष्ट पाप के लिए परमेश्वर का न्याय नहीं है। परन्तु मुझे निष्कपट होना था, इसलिए मैंने उससे कहा कि मुझे नहीं पता। हो सकता है यह परमेश्वर का न्याय हो, परन्तु हो सकता है ऐसा न हो। मैं परमेश्वर की गुप्त सम्मति को पूर्ण रूप से नहीं समझ सकता या उसके प्रावधान के अदृश्य हाथों का अर्थ नहीं निकाल सकता, इसलिए मैं नहीं जानता था कि वह क्यों दुख उठा रही है। हालाँकि, मैं यह जानता था, कि इसका कारण कोई भी हो, उसके अपराध-बोध का एक उत्तर था। हमने ख्रीष्ट की दया और क्रूस के विषय में बात की, और वह विश्वास में मर गयी।

उस महिला द्वारा उठाया गया प्रश्न प्रतिदिन उन लोगों द्वारा पूछा जाता है जो कष्ट उठा रहे हैं। यह नए नियम के अत्यन्त कठिन खण्डों में से एक में सम्बोधित किया गया है। यूहन्ना 9 में, हम पढ़ते हैं, “फिर जाते हुए उसने एक मनुष्य को देखा जो जन्म से अन्धा था। और उसके चेलों ने यहा कहते हुए उस से पूछा, ‘रब्बी, किसने पाप किया, इस मनुष्य ने या इसके माता-पिता ने, कि यह अन्धा जन्मा?’ यीशु ने उत्तर दिया, ‘न तो इस मनुष्य ने पाप किया, न ही इसके माता-पिता ने, पर यह इसलिए हुआ कि परमेश्वर के कार्य उसमें प्रकट हों’” (पद 1-3)।

यीशु के चेलों ने ऐसा क्यों माना कि मनुष्य के अन्धेपन का मूल कारण उसका पाप या उसके माता-पिता का पाप है? उनके पास निश्चित रूप से इस धारणा का कुछ आधार था, क्योंकि पवित्रशास्त्र, पतन की घटना के पश्चात् से, यह स्पष्ट कर देता है कि इस संसार में दुख, रोग, और मृत्यु के होने का कारण पाप है। चेले सही थे कि इस मनुष्य के दुख उठाने में किसी न किसी प्रकार से पाप सम्मिलित था। साथ ही, बाइबल में ऐसे उदाहरण हैं जिसमें परमेश्वर किसी विशिष्ट पापों के कारण कष्ट उत्पन्न करता है। प्राचीन इस्राएल में, परमेश्वर ने मूसा की बहन, मरियम को कोढ़ से पीड़ित किया क्योंकि उसने मूसा के परमेश्वर के प्रवक्ता होने की भूमिका पर प्रश्न उठाया था (गिनती 12:1-10)। उसी प्रकार, परमेश्वर ने दाऊद के पाप के परिणामस्वरूप बतशेबा से उत्पन्न हुई सन्तान की जान ले ली (2 शमूएल12:14-18)। बच्चे को दण्डित किया गया, इसलिए नहीं कि बच्चे ने कुछ किया था, परन्तु दाऊद पर परमेश्वर के न्याय के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में किया गया।

परन्तु,चेलों ने पाप और दुख उठाने के मध्य के सामान्य सम्बन्ध को उस विशिष्ट घटना पर लागू करने की भूल की थी। उन्होंने माना कि अन्धे व्यक्ति के पाप और उसके दुख उठाने के मध्य एक प्रत्यक्ष सामंजस्यता थी। क्या उन्होंने अय्यूब की पुस्तक को नहीं पढ़ा था, जो कि एक व्यक्ति के विषय में है जो कि निर्दोष था फिर भी परमेश्वर के द्वारा गम्भीर रूप कष्ट पाया हुआ था। जब एक अन्य विकल्प था तो चेलों ने विकल्पों को घटाकर दो करने की भूल कर दी। उन्होंने अपने प्रश्न को यीशु के सम्मुख एक बनावट में रखा, यह मानते हुए कि उस मनुष्य का पाप या उसके माता-पिता का पाप उसके अन्धेपन का कारण था, उन्होंने झूठी दुविधा के तार्किक भ्रम को स्वीकार किया।            

ऐसा प्रतीत होता है कि चेलों ने यह भी मान लिया था कि जिस किसी को भी कष्ट है वह किए गए पाप के सीधे अनुपात में दुख उठाता है। फिर से, अय्यूब की पुस्तक उस निष्कर्ष के टुकड़े कर देती है, क्योंकि जिस सीमा के दुख सहने के लिए अय्यूब को बुलाया गया था वह तुल्नात्मक रीति से बहुत अधिक था उन लोगों के दुखों और कष्टों से जो कि उससे कहीं अधिक दोषी थे।

हमें कभी सीधे निष्कर्ष पर नहीं आ जाना चाहिए कि दुख उठाने की एक विशिष्ट घटना एक व्यक्ति के विशेष पाप के लिए एक प्रत्यक्ष प्रत्युत्तर या पाप में प्रत्यक्ष सामंजस्यता है। जन्म से अन्धे मनुष्य की कहानी इस बात को स्पष्ट करती है।

हमारे प्रभु ने चेलों के प्रश्न का उत्तर कि मनुष्य का अन्धापन उसके या उसके माता-पिता के पाप का प्रत्यक्ष परिणाम था, इस झूठी धारणा को सुधारते हुए दिया। उसने उन्हें आश्वासित किया कि वह मनुष्य जन्म से अन्धा इसलिए नहीं था क्योंकि परमेश्वर ने उस मनुष्य या उसके माता-पिता को दण्ड दिया था। उसका एक अन्य कारण था। और क्योंकि उस स्थिति में एक अन्य कारण था, ऐसे ही कष्टों के सदैव अन्य कारण हो सकते हैं जिन्हें सहने के लिए परमेश्वर हमें बुलाता है।

यीशु ने अपने चेलों को यह कह कर उत्तर दिया, “न तो इस मनुष्य ने पाप किया, न ही इसके माता-पिता ने, पर यह इसलिए हुआ कि परमेश्वर के कार्य उसमें प्रकट हों” (पद 3)। वह क्या कहना चाहता था? सरल रूप में कहें तो, यीशु ने कहा कि मनुष्य अन्धा था ताकि यीशु की सामर्थ्य और ईश्वरत्व की एक साक्षी के रूप में ,वह उसे नियत समय पर चंगा कर सके। हमारे प्रभु ने इस चंगाई में अपनी पहचान एक उद्धारकर्ता और परमेश्वर के पुत्र के रूप में प्रदर्शित की।

जब हम दुख उठाते हैं, तो हमें यह भरोसा रखना चाहिए कि परमेश्वर जानता है कि वह क्या कर रहा है, और वह अपनी महिमा और अपने लोगों के पवित्रीकरण के लिए उनके दुखों और कष्टों में और उसके माध्यम से कार्य करता है। लम्बी अवधि तक दुख सहना कठिन है, परन्तु कठिनाई तब अत्यन्त हल्की हो जाती है जब हम अपने प्रभु को जन्म से अन्धे मनुष्य की घटना के भेद को समझाते हुए सुनते हैं, जिसे परमेश्वर ने यीशु की महिमा के लिए कई वर्षों की पीड़ा के लिए बुलाया था।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
आर.सी. स्प्रोल
आर.सी. स्प्रोल
डॉ. आर.सी. स्प्रोल, लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ के संस्थापक थे, जो सैनफोर्ड, फ्लोरिडा में सेंट एंड्रयू चैपल के पास्टर और रिफॉर्मेशन बाइबल कॉलेज के पहले अध्यक्ष थे। वह सौ से अधिक पुस्तकों के लेखक थे, जिसमें द होलिनेस ऑफ गॉड सम्मिलित है।